ज्ञान

कहा जाता है कि अकेला एक ज्ञान “केवलज्ञान” होता है। लेकिन विशेष परिस्थितियों में मतिज्ञान भी अकेला रह सकता है जैसे शिवभूति मुनिराज को णमोकार याद नहीं होता था पर भेदविज्ञान का चिंतन करने से केवलज्ञान हो गया। उनके द्रव्यश्रुत के सापेक्ष अकेला मतिज्ञान रहा।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 28 अगस्त)

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4 Responses

  1. ज्ञान का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए भेदविज्ञान का चिंतन करना परम आवश्यक है।

  2. ज्ञान का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए भेदविज्ञान को समझना परम आवश्यक है।

  3. ज्ञान का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए भेदविज्ञान पर श्रद्बा करना एवं विश्वास करना परम आवश्यक है।

  4. ज्ञान का उदाहरण दिया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए भेदविज्ञान पर विश्वास एवं श्रद्बान करना परम आवश्यक है।

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