Month: February 2026

नय

नय हमारे लिये। अपराध स्थल से छोटे-छोटे सबूतों को जुटाकर केस सुलझाते हैं। लेकिन हमेशा सुलझा नहीं पाते हैं। इसीलिये भगवान जब तक सर्वज्ञ नहीं

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सीमा

साधना की सीमा क्या होनी चाहिये ? साध्य की प्राप्ति तक। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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ब्रह्मचर्य

ब्रह्मचर्य व्रत … आलम्ब सहित। ब्रह्मचर्य धर्म … आलम्ब रहित। (नीलेश भैया – सांगानेर)

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प्रवेश

अपने मकान/ मच्छरदानी में एक छोटे से मच्छर का भी प्रवेश वर्जित है। अपनी आत्मा में दुश्मनों का भी प्रवेश वर्जित नहीं ! चिंतन

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जैन धर्म

जैन धर्म महान क्यों ? जैन धर्म ने भगवान बनाये। अन्य मतों में भगवान, धर्म बनाते हैं। आर्यिका सुयोग्यनंदनी माताजी

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मोह / राग

मोह हो तो राग बढ़ता है, राग हो तो मोह। क्षु. श्री सहजानन्द जी

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अध्यात्म

अध्यात्म… संकल्प… मैं शरीर हूँ। विकल्प… शरीर के सुख-दु:ख से सुखी-दु:खी। इन संकल्प/ विकल्प से दूर होना अध्यात्म। भेद-विज्ञान जानना, मानना तथा अनुभव में लाना।

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पुण्य

पुण्य जल है, पाप मल है। ऐसे पुण्य का अर्जन करो जो पाप को धो दे। ऐसे पुण्य का अर्जन, पवित्र परिणामों से होता है।

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असंयम

जितना राग, उतना द्वेष। इंद्रिय असंयम से ही प्राणी असंयम जैसे द्विदल से। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 8/01)

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सांस

सांस ही जीवन है। जितनी अधिक सांस व्यय करेंगे उतना जीवन नष्ट होगा। यदि प्राणायाम नहीं कर सकते तो लम्बी-लम्बी गहरी सांस लें। निर्यापक मुनि

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मंगल आशीष

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