Month: July 2026
जीव
जीव उपयोग लक्षण वाला, अंत रहित (अनादि-अनंत), अपने कर्म का करने वाला अर्थात कर्ता और भोगने वाला है। समणसुत्तं – गाथा 592
धार्मिक / धर्मात्मा
धार्मिक –> जो धार्मिक क्रियायें करे। धर्मात्मा –> जिसकी आत्मा में धर्म आ गया हो/ धर्म को आत्मसात कर लिया हो। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर
तप
श्रावक का तप –> अभक्ष्य त्याग से तप शुरू। रात्रिभोजन त्यागादि से तप बढ़ता चला जाता है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
कोटा
कोटा पद्धत्ति तो Tension ही देती है। चाहे सरकारी नौकरियों में हो या धार्मिक क्रियाओं का (कोटा फिक्स करके धर्म करना)। चिंतन
संगति
संगति –> निमित्त-नैमित्तिक संबंध। संगति से परिणाम, परिणाम से कषाय। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
स्वाध्याय
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे –> लोग क्रमबद्ध-पर्याय की बात तो करते हैं जिसका शास्त्रों में नाम भी नहीं है। पर “क्रमबद्ध-स्वाध्याय” की बात
अपराध
जीवन का दुरुपयोग करना तो अपराध है ही लेकिन सदुपयोग ना करना भी अपराध है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
ज्ञान
अवरोधों को दूर कर ज्ञान पाने में हमको मेहनत करनी पड़ती है, सम्यग्ज्ञानी को नहीं; क्योंकि यह आत्मा का स्वभाव है। क्षु.श्री सहजानन्द जी
मन
दो प्रकार के मन मानो → एक शरीर का दूसरा आत्मा का। शरीर का मन कहता है खाओ पीओ ऐश करो। आत्मा का मन कहता
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