Month: July 2026
कर्मबंध
नो-कर्मबंध के हेतु -> परिवारजन/ शरीर। नो-कर्मबंध टूटने पर कर्मबंध टूटते हैं, कर्मबंध टूटने पर नो-कर्मबंध टूटते हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थसूत्र – अध्याय
प्रतिक्रिया
गुस्से वाले मुर्गे के सामने शीशा रख दो। मुर्गा चोंच मार-मार कर ख़ुद को घायल कर लेगा। दूसरा मुर्गा बच जाएगा। हम भी यदि प्रतिक्रिया
श्रावक
श्रावक… पाक्षिक श्रावक…भगवान का पक्ष, अणुव्रत नहीं, सप्तव्यसन त्यागी, अष्ट मूलगुणधारी, 4 गुणस्थान। नैष्ठिक श्रावक…भोजन/ पानी मर्यादित, प्रतिमाधारी, 5 गुणस्थान। साधक श्रावक… सल्लेखना अभ्यासी/ प्राप्ति।
आयु
बाह्य जगत अंतर जगत आयु बढ़ती है आयु घटती है मोह से प्रभावित निर्मोह से आयु बढ़ने के साथ अभिमान बची आयु के सदुपयोग के
स्वाध्याय
श्रावकों के लिये प्राचीन शास्त्रों* का स्वाध्याय करने को नहीं कहा, यह तो मुनियों के लिए था। श्रावकों को तो पूजा, आरंभिक हिंसा तथा परिग्रह
दर्शन / अध्यात्म
दर्शन के बिना अध्यात्म, जीवन चल सकता है। बिना अध्यात्म के, दर्शन का दर्शन नहीं। अध्यात्म स्वाधीन नयन है। दर्शन पराधीन, उपनयन है (उदाहरण चश्मा)।
दर्शन
दर्शन… व्यावहारिक देखना नहीं। ज्ञान से पहले का सामान्य अवलोकन जिसमें न विशेषता ग्रहण, न पदार्थ की जाति, न क्रिया, ना ही गुण ग्रहण होते
जरूरत के चरण
जरूरत के चरण… भूख/ शरीर सम्बन्धित। सुरक्षा। परिवार/ संगति। सम्मान। आत्मनिष्ठ/ आत्मजागृति। पूर्व के दर्शन में भगवान राजाओं के पुत्र थे सो चार चरण पहले
भक्त-प्रत्याख्यान
भक्त-प्रत्याख्यान… आहार क्रमश: छोड़ते हुए समाधि। संघ की जिम्मेदारियों को छोड़कर समाधि ग्रहण करना। (आचार्य श्री विद्यासागर जी की समाधि दोनों दृष्टि से ऐसी ही
अभ्यास
आम के बौर आते ही एक चिड़िया की नई सी आवाज आई। थोड़े अंतराल के साथ आवाज मधुर होती गई। अंत में वह कोयल की
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