श्रद्धा – संसार जीवों से ठसाठस भरा है। कुछ दृश्य, कुछ अदृश्य।
धर्म – दृश्य की रक्षा और अदृश्य की रक्षा के भाव रखना।

चिंतन

मध्य-पूर्व में दो समुद्र हैं – डैड सी और गैलिली सी। दोनों में पानी जाॅर्डन नदी से आता है। डैड सी में न तो मछलियाँ हैं, न ही कोई वनस्पति, जबकि गैलिली सी में भाँति-भाँति की वनस्पति व मछलियाँ होती हैं।

इतना फ़र्क क्यों?

गैलिली सी के पानी से गाँवों और शहरों की प्यास बुझती है, खेती होती है। गैलिली सी में कुछ समय विश्राम कर जार्डन नदी भी डैड सी की ओर चल पड़ती है। लगातार पानी का निकास होता रहता है, पर आमद और ख़र्च का संतुलन बना हुआ है।
इसके विपरीत डैड सी किसी को कुछ नहीं देता; फिर भी भीषण गर्मी के कारण उसमें पानी लगातार कम हो रहा है, और इतना खारा हो चुका है कि उसमें जीवन संभव नहीं।

हम क्या बनना चाहते हैं ? डैड सी की तरह ज़िंदा रहते हुए भी मुर्दा, या गैलिली सी की तरह जीवंत और जीवनदायी?

(कमलकांत)

क्रम – ‘क’, ‘ख’, ‘ग’, ‘घ’।
पहले ‘क’ = कर्म,
फिर ‘ख’ = खाना,
‘ग’ = गाना,
‘घ’ = घंटा, जीवन झंकृत हो जायेगा।
पर हम व्यर्थ के कामों में ज्यादा श्रम करते हैं, सार्थक में कम।
सगर चक्रवर्ती राजा के पुत्रों ने बिना श्रम किये जीना नहीं चाहा था, इसलिये उन्होंने भरत चक्रवर्ती द्वारा निर्मित 72 मन्दिरों के चारौ ओर सुरक्षा के लिये ख़ुद खाई खोदी।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

कर्मोदय सताता/भटकाता नहीं कुछ समय के लिये अटका सकता है।
कर्मोदय में पुरुषार्थ की कमी/रागद्वेष करने से भटकन/दु:ख होता है।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

हमेशा अपने अनुभव से काम करें, क्योंकि 50 ग्रंथों का सार… स्वयं का अनुभव ही है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

बवंडर ख़ुद दिशाहीन/भ्रमित, औरों के भी विनाश में कारण।
यदि हवा की दिशा निश्चित हो तो नाव को किनारे, सही दिशा में चलने वालों को मंज़िल तक जल्दी पहुँचाने में सहायक होती है।

चिंतन

हनुमान जब सीता को ढूँढ़ने लंका जा रहे थे तब उन्होंने पूछा – लंका को पहचानूँगा कैसे ?
जहाँ लोग सूर्योदय के बाद भी सोते रहते हों !
सूर्योदय से एक मुहूर्त पहले से लेकर एक मुहूर्त बाद तक का काल शुभ/धार्मिक क्रियाओं का काल होता है।

मुनि श्री सुधासागर जी

मार्ग – दो
1. साधना – दृढ़ इच्छा वालों के लिये, कुछ लोग ही कर पाते हैं।
अपने भुजबल से नदी पार करना।
2. आराधना – सामान्य व्यक्तियों के लिये नाव/ट्यूब के सहारे नदी पार करना।
भवसागर दोनों ही से पार कर सकते हैं, पहले आराधना फिर साधना से।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

अनुरूप चाहने में बुराई नहीं पर हरेक को/ हर घटना को अपने अनुरूप बनाना, गलत सोच/ दु:ख का कारण है।
हर व्यक्ति अपने-अपने स्वभाव से चलता है/ घटनायें नियति के अनुसार घटित/ नियंत्रित होती है।
व्यापक दृष्टि से देखने से सहज भाव आता है।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

द्रोणगिर में हम 4-5 बहनों के आचार्य श्री विद्यासागर जी के प्रथम दर्शन के समय, मैने आ. श्री से कुछ व्रत/नियम के लिये प्रार्थना की।
आचार्य श्री ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखकर कहा – आर्यिका (साध्वी) बनो।
शुरुआत कहाँ से करुँ ?
चल-चित्र देखती हो ?
कभी-कभी।
देखना बंद कर दो।
दूसरे दर्शन में व्रत मांगने पर – तत्त्वार्थ सूत्र के उपवास करो।
विधि ?
पंडित पन्नालाल सागर वालों से समझ लेना (उन्हें कैसे पता कि मैं सागर की हूँ और उन्हीं पंड़ित जी से पढ़ती हूँ !)

आर्यिका श्री दृढमति माताजी

तकलीफें बहुत, सो रहना नहीं;
इस युग में मंज़िल (मोक्ष) मिलना नहीं।
आचार्य श्री विद्यासागर जी –
“अब और नहीं, छोर चाहता हूँ।
घोर नहीं, भोर चाहता हूँ” ।
सज्जन मारता नहीं, साधु बचता भी नहीं।
बड़े गृहस्थ भी अस्त्र शस्त्र नहीं रखते, जैसे राष्ट्रपति।

मुनि श्री सुधासागर जी

ग्वालियर स्टेशन पर एक व्यक्ति Enquiry कर रहा था –
आगरा जाने वाली गाड़ियाँ कितने-कितने बजे है।
फ़िर झाँसी जाने वाली ट्रेनों के बारे में पूछने लगा।
पर तुम्हें जाना आगरा है या झाँसी ?
मुझे तो बस Track Cross करना है।
हम सबकी विडम्बना तो उस व्यक्ति से भी ज्यादा जटिल है –
हमारा Target तो Line Cross करने का भी नहीं है, हम तो जीवनपर्यंत सिर्फ Enquiry ही करते रहते हैं।

चिंतन

Routine काम करते-करते उनको ऊब नहीं आती जो अपने काम में डूब जाते हैं।
डूब कर काम करने से नये-नये उत्साह का संचार होता है/नये-नये अनुभव होते हैं, फिर वह Routine नहीं रह जाता जैसे साधुजन।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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