लड्डू की सुंदरता/ सुगंधि/ क़ीमत तभी तक, जब तक खाने वाले से संयोग न हो।
बाद में तो दुर्गति ही।
क्षु.श्री सहजानन्द जी
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संयोग को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। जीवन में संयोग एवं वियोग आते रहते हैं लेकिन उनसे विचलित न होकर बल्कि सहज भाव से स्वीकार करना परम आवश्यक है। अतः ऐसे संयोग से बचना चाहिए, जिसमें दुर्गति न हो सकें।
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संयोग को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। जीवन में संयोग एवं वियोग आते रहते हैं लेकिन उनसे विचलित न होकर बल्कि सहज भाव से स्वीकार करना परम आवश्यक है। अतः ऐसे संयोग से बचना चाहिए, जिसमें दुर्गति न हो सकें।