Category: अगला-कदम

द्रव्येंद्रिय

निर्वृत्ति – रचना/बनावट आभ्यंतर – आत्मप्रदेश बाह्य – इंद्रियों का आकार/रचना उपकरण – निर्वृत्ति का उपकार करने वाली आभ्यंतर – जैसे नेत्रों का सफेद मंड़ल बाह्य

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सूक्ष्म

प्रत्येक वनस्पति के सूक्ष्म (शरीर) नाम कर्म नहीं होता । करूणानुयोग दीपक – P 31

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ज्ञान

मति, श्रुत, अवधिज्ञान – मिथ्या व सम्यक् होते हैं । (तत्वार्थसूत्र 1/31) आचार्य श्री – “च” से यहाँ मिश्र ज्ञान भी लेना चाहिये । पाठशाला

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द्रव्य/भाव

भाव में वर्तमान की प्रधानता होती है, द्रव्य में वर्तमान की प्रधानता नहीं होती है । क्षु. श्री ध्यानसागर जी

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शरीर

नाम कर्म के उदय से प्राप्त होकर शीर्यन्ते (गलते) हैं, वे शरीर हैं ।

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भाव

मुक्त जीवों के दो भाव (क्षायिक, पारिणामिक) तथा संसारिओं के 3, 4, तथा 5 भाव होते हैं ।

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स्थिति

उत्कृष्ट संज्ञी के ही । जैसे मोहनीय ,संज्ञी के 70 कोड़ा कोड़ी सागर पर एक इंद्रिय के एक सागर से अधिक नहीं । पाठशाला

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मंगल आशीष

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