Category: अगला-कदम

जीव का स्वभाव

कहा है कि जीव का स्वभाव ऊर्ध्वगमन का होता है, पर हर स्थिति में संभव नहीं हो सकता है। इसलिये इसे सिर्फ़ स्वभाव की अपेक्षा

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वेदक-सम्यग्दर्शन

जो वेदन कराये सम्यग्दर्शन का उसे वेदक-सम्यग्दर्शन कहते हैं । यह आयतनों से जुड़े रहने से बना रहता है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (शंका समाधान

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लौकांतिक देव

लौकांतिक देव को श्रुत केवली नहीं कह सकते हैं। ये पढ़ा नहीं सकते बस द्वादशांग के पाठी हैं। ज्ञान का क्षयोपशम होता है पर अंतिम

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अंधकार

9वें अरुणद्वीप से घना अंधकार (जिसे हज़ारों सूर्य भी नहीं छेद सकते हैं। वयलाकार Shape में ब्रम्हलोक के सबसे ऊपर के अरिष्ट विमान तक उठता

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विपाक

पुद्गल(कुर्सी आदि) का विपाक प्राय: समय पर ही, कर्म का कभी भी जैसे आयु/ अकाल मृत्यु। मुनि श्री अजितसागर जी

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शरीर के वर्ण

1. बादर तैजसकायिक… पीत (शिखा, मूल में) । 2. बादर जलकायिक …. शुक्ल (बिना रंग के जल दिखेगा कैसे ! धार/ समूह में साफ दिखता

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सामायिक संयम

सामायिक संयम सब संयमों (प्राणी, इंद्रिय, अहिंसादि – 5 व्रत) का संग्रह है। बड़ी कठिनाई से प्राप्त होता है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जीव काण्ड

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मन:पर्यय

मनःपर्यय ज्ञान… 1. ऋजुमति – 3 प्रकार का –> सरल मन, वचन, काय की चेष्टाओं को जाने। 2. विपुलमति – 6 प्रकार का –> सरल

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विस्रसोपचय

विस्र = स्वभाव से उपचित(चिपकने वाले); कर्म/ नोकर्म से निरपेक्ष, कर्म/ नोकर्म परमाणुओं पर स्थित। ये रूक्ष या स्निग्ध होते हैं, इसीलिये चिपके रहते हैं।

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केवल ज्ञानी

हुंडक संस्थान का उदय 14वें गुणस्थान तक रहता है। सामान्य केवलज्ञानी के दाढ़ी मूंछें यथावत् रहती हैं। शलाका पुरुषों के दाढ़ी मूंछें नहीं होतीं, तीर्थंकरों

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मंगल आशीष

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