Category: अगला-कदम

मन

द्रव्य-मन… पौद्गलिक, भाव-मन… आत्मा की परिणति। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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विश्वास

वृद्धों में प्राय: अंधविश्वास देखने में आता है। युवाओं में अंधाविश्वास। ब्र. डॉ. नीलेश भैया

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“पर”

“पर” को अपना मानने की आदत नहीं छूट रही तो “पर” के घर आदि को अपना मान कर देख लो। क्षु. सहजानंद जी

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विद्याधरों को विद्या

विद्याधरों को 5 विद्याएँ कुल-परम्परा से मिलती हैं। आगे सिद्ध करके/ छीनकर ली जाती हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जीवकांड गाथा – 360 )

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उदयाभावी क्षय

क्षय कैसे ? गंदगी का ऊपर न आने देना, उदयाभावी क्षय। उपशम कैसे ? सदवस्था रुप उपशम, गंदगी नीचे ही बैठी है। मुनि श्री मंगलसागर

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सम्यग्दर्शन

क्या सम्यग्दर्शन के बिना भी धर्म हो सकता है ? किसी लिफाफे पर पता लिखा ही न हो, तो क्या वह गंतव्य पर पहुँचेगा ?

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पुण्य

पुण्य का उपयोग -> पुण्यानुबंधी पुण्य, पुण्य का उपभोग -> पापानुबंधी पुण्य।

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द्रव्य का महत्व

समवसरण में पहले गुणस्थान वाले मुनि भी 13वें गुणस्थान वाले केवलियों के साथ एक कोठे में बैठते हैं। जबकि पाँचवें गुणस्थान तक वाले श्रावक अलग

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मंगल आशीष

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January 29, 2026

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