Category: अगला-कदम

सम्यग्दर्शन

क्या सम्यग्दर्शन के बिना भी धर्म हो सकता है ? किसी लिफाफे पर पता लिखा ही न हो, तो क्या वह गंतव्य पर पहुँचेगा ?

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पुण्य

पुण्य का उपयोग -> पुण्यानुबंधी पुण्य, पुण्य का उपभोग -> पापानुबंधी पुण्य।

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द्रव्य का महत्व

समवसरण में पहले गुणस्थान वाले मुनि भी 13वें गुणस्थान वाले केवलियों के साथ एक कोठे में बैठते हैं। जबकि पाँचवें गुणस्थान तक वाले श्रावक अलग

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औदयिक भाव

तीर्थंकर-प्रकृति को छोड़कर, औदयिक भाव बंध के कारण होते हैं । निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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9 लब्धि

भोग और उपभोग लब्धियाँ तीर्थंकरों को ही होती हैं। सामान्य केवलियों के भी पूरी 9 लब्धि होती हैं, पर अंतरंग। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ

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द्रव्य / पदार्थ / तत्त्व

द्रव्य जब किसी पद पर स्थापित हो जाता है तो पदार्थ कहलाने लगता है। उसका जो सार होता है, वह तत्त्व हो जाता है। निर्यापक

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अगुरुलघु

यह सब गुणों को शक्ति देता है जैसे खजांची। अगुरुलघु सब द्रव्यों (पुद्गल में भी) में पाया जाता है। सिद्ध पर्याय को नीचे नहीं गिरने

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साता/असाता

शुद्ध निश्चय नय से कर्म, कर्म में है, “मैं अपने में” ऐसा ज्ञानी सोचता है। तब उसे सुख-दु:ख में हर्ष-विषाद नहीं होता है। इस प्रकार

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सर्वज्ञ

सर्वज्ञ सबको कैसे जान लेते हैं ? खुद को जानने से सबको जान लेते हैं। क्योंकि खुद को जानने से जीव के स्वरूप को जान

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भेद-अभेद

भेद – मेरे शरीर में दर्द है। अभेद – मैं मर जाऊँगा (मिथ्यात्व)। जैसे बुंदेलखंड आदि में ‘स’, ‘श’, ‘ष’ बोलने में भेद नहीं करते

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मंगल आशीष

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