Category: अगला-कदम

मोह

मोह प्राय: निकृष्ट/ लुटेरों/ खचोरों से ही होता है। क्षु. सहजानंद जी (सज्जन लूटेगा/ खचोरेगा नहीं)।

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अंतराय / गोत्र

अंतराय, गोत्र कर्म में विघ्न कैसे डालता है ? उच्च गोत्र वालों से नीच गोत्र जैसे कर्म करवा कर। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र

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निराकुलता

अतिभाव तथा अतिअभाव दोनों ही आकुलता देते हैं।* समभाव से ही निराकुलता आती है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी *(अति-निर्देश भी)।

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मन

द्रव्य-मन… पौद्गलिक, भाव-मन… आत्मा की परिणति। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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विश्वास

वृद्धों में प्राय: अंधविश्वास देखने में आता है। युवाओं में अंधाविश्वास। ब्र. डॉ. नीलेश भैया

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“पर”

“पर” को अपना मानने की आदत नहीं छूट रही तो “पर” के घर आदि को अपना मान कर देख लो। क्षु. सहजानंद जी

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विद्याधरों को विद्या

विद्याधरों को 5 विद्याएँ कुल-परम्परा से मिलती हैं। आगे सिद्ध करके/ छीनकर ली जाती हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जीवकांड गाथा – 360 )

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उदयाभावी क्षय

क्षय कैसे ? गंदगी का ऊपर न आने देना, उदयाभावी क्षय। उपशम कैसे ? सदवस्था रुप उपशम, गंदगी नीचे ही बैठी है। मुनि श्री मंगलसागर

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मंगल आशीष

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