Category: अगला-कदम
उदयाभावी क्षय
क्षय कैसे ? गंदगी का ऊपर न आने देना, उदयाभावी क्षय। उपशम कैसे ? सदवस्था रुप उपशम, गंदगी नीचे ही बैठी है। मुनि श्री मंगलसागर
नारकियों में परिग्रह
नारकियों में परिग्रह संज्ञा कैसे घटित करें? निधि – मुम्बई शरीर तथा इच्छा की अपेक्षा।
सम्यग्दर्शन
क्या सम्यग्दर्शन के बिना भी धर्म हो सकता है ? किसी लिफाफे पर पता लिखा ही न हो, तो क्या वह गंतव्य पर पहुँचेगा ?
पुण्य
पुण्य का उपयोग -> पुण्यानुबंधी पुण्य, पुण्य का उपभोग -> पापानुबंधी पुण्य।
द्रव्य का महत्व
समवसरण में पहले गुणस्थान वाले मुनि भी 13वें गुणस्थान वाले केवलियों के साथ एक कोठे में बैठते हैं। जबकि पाँचवें गुणस्थान तक वाले श्रावक अलग
औदयिक भाव
तीर्थंकर-प्रकृति को छोड़कर, औदयिक भाव बंध के कारण होते हैं । निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
9 लब्धि
भोग और उपभोग लब्धियाँ तीर्थंकरों को ही होती हैं। सामान्य केवलियों के भी पूरी 9 लब्धि होती हैं, पर अंतरंग। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ
द्रव्य / पदार्थ / तत्त्व
द्रव्य जब किसी पद पर स्थापित हो जाता है तो पदार्थ कहलाने लगता है। उसका जो सार होता है, वह तत्त्व हो जाता है। निर्यापक
अगुरुलघु
यह सब गुणों को शक्ति देता है जैसे खजांची। अगुरुलघु सब द्रव्यों (पुद्गल में भी) में पाया जाता है। सिद्ध पर्याय को नीचे नहीं गिरने
साता/असाता
शुद्ध निश्चय नय से कर्म, कर्म में है, “मैं अपने में” ऐसा ज्ञानी सोचता है। तब उसे सुख-दु:ख में हर्ष-विषाद नहीं होता है। इस प्रकार
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