Category: अगला-कदम

द्रव्य / तत्त्व / पदार्थ

जीव (आत्मा)………… द्रव्य। जीवत्व…………………..तत्त्व। जीव की पर्याय (मनुष्यादि)… पदार्थ। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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श्रावक / आत्मानुभव

जब तक बाह्य दृष्टि रहेगी, अंतरंग पर दृष्टि/ आत्मानुभूति कैसे हो सकती है? श्रावक बाह्य से दृष्टि हटा नहीं सकता। चिंतन</span

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साता

असाता से साता में जाने का तरीका –> पूजा, स्वाध्याय आदि का कोटा तय मत करो, समय की सीमा बना लो जैसे एक मुहूर्त पूजा

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नय

नय हमारे लिए। अपराध स्थल से छोटे-छोटे सबूतों को जुटाकर केस सुलझाते हैं। लेकिन हमेशा सुलझा नहीं पाते हैं। इसीलिए भगवान जब तक सर्वज्ञ नहीं

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नामकर्म प्रकृतियाँ

93 नामकर्म प्रकृतियों में से 13 अरहंत भगवान की 63 प्रकृतियों के क्षय के साथ समाप्त हो जाती हैं, बाकी 14 गुणस्थान में, ऐसा क्यों

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आहार

आहार पर्याप्ति कारण है, आहार संज्ञा कार्य। चिंतन

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केवली के निर्जरा

ऐसा लगता है कि 13वें गुणस्थान में आखिरी अंतर्मुहूर्त को छोड़कर सविपाक निर्जरा ही होती है। चिंतन

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मोह

मोह प्राय: निकृष्ट/ लुटेरों/ खचोरों से ही होता है। क्षु. सहजानंद जी (सज्जन लूटेगा/ खचोरेगा नहीं)।

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अंतराय / गोत्र

अंतराय, गोत्र कर्म में विघ्न कैसे डालता है ? उच्च गोत्र वालों से नीच गोत्र जैसे कर्म करवा कर। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र

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निराकुलता

अतिभाव तथा अतिअभाव दोनों ही आकुलता देते हैं।* समभाव से ही निराकुलता आती है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी *(अति-निर्देश भी)।

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मंगल आशीष

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