Category: अगला-कदम
भवनत्रिक में लेश्या
मान्यता है कि भवनत्रिक में पीत तथा तीन अशुभ लेश्या होती हैं और अशुभ लेश्या अपर्याप्तक अवस्था में ही होती हैं। तत्तवार्थसूत्र में ऐसा कोई
निगोदिया / साधारण
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे कि साधारण जीव के आश्रित अनंत निगोदिया रहते हैं। पर निगोदिया जीव को साधारण नहीं कहते, यह एक अलग
मनुष्य
मनुष्य पर्याय में पर्याप्तकों की संख्या अधिक होती है, अपर्याप्तकों से। कारण ! मनुष्य पर्याय में पुण्यात्मा जन्म लेते हैं। मुनि श्री सौम्य सागर जी
कल्प
कहा गया है कि कल्प पहले से सोलहवें स्वर्ग में होते हैं। तो भवनत्रिक में ? वहाँ देवों में Categories तो होती हैं पर उन्हें
सम्यग्दर्शन
द्वितीयोपशम सम्यग्दर्शन अनंतानुबंधी की विसंयोजना तथा दर्शनमोहनीय के उपशम से होता है। जबकि प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन में विसंयोजना की जरूरत नहीं। मुनि श्री सौम्य सागर जी
पंचम गति
ऊपर की परम गति, संयम से सिद्ध( अवस्था)। नीचे की परम असंयम से निगोद।। मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी
अवगाहना/ आवली
अवगाहना घनफल रूप भी होती है(गाथा 96)। आवली को अवगाहना तथा भाव(गुणाकार रुप) में भी लिया है(गाथा 101)। मुनि श्री सौम्य सागर जी (जीवकांड –
जघन्य अवगाहना
अपर्याप्तक निगोदिया जीव के शरीर की अवगाहना पहले समय में आयताकार, दूसरे में घनाकार और तीसरे समय में गोल हो जाती है, यही किसी भी
देवों की गति
देव अगले भव में अग्नि और वायुकायिक जीवों में जन्म नहीं लेते। कारण ? अग्नि और वायुकायिक जीवों में विक्रिया करने की शक्ति होती है
देश/सर्वघाती कषाय
प्रत्याख्यानावरण कषाय सर्वघाती क्योंकि चारित्र (सकल) नहीं होने देती। संज्वलन देशघाती क्योंकि चारित्र होने देती लेकिन यथाख्यात चारित्र ना होने देने की अपेक्षा सर्वघाती। मुनि
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