Category: अगला-कदम

देवों की गति

देव अगले भव में अग्नि और वायुकायिक जीवों में जन्म नहीं लेते। कारण ? अग्नि और वायुकायिक जीवों में विक्रिया करने की शक्ति होती है

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देश/सर्वघाती कषाय

प्रत्याख्यानावरण कषाय सर्वघाती क्योंकि चारित्र (सकल) नहीं होने देती। संज्वलन देशघाती क्योंकि चारित्र होने देती लेकिन यथाख्यात चारित्र ना होने देने की अपेक्षा सर्वघाती। मुनि

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विसंयोजना / उद्वेलना

विसंयोजना अनंतानुबंधी की ही, यह नरक में भी हो सकती है। इसमें 6-7 गुणस्थान से भी असंख्यातगुणी निर्जरा उस समय होती है जब विसंयोजना चल

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जीव/पुद्गल विपाकी

जीव – विपाकी… जिसे जीव Direct Feel करें(जैसे घातिया कर्म)। पुद्गल – विपाकी… जैसे शरीर नामकर्म, Feel जीव ही करेगा लेकिन शरीर के माध्यम से,

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धन प्राप्ति

धन प्राप्ति पुण्योदय से नहीं, कर्मों के क्षयोपशम से होती है। धन का प्रयोग भी कर्मों (लाभांतराय तथा भोगांतराय) के क्षयोपशम से। मुनि श्री सौम्य

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आगम – विज्ञान

श्री राजवार्तिक में आचार्य श्री अकलंक स्वामी ने 1400-1500 साल पहले लिखा था → “शब्द पौद्गलिक है इसलिये उनका संग्रह किया जा सकता है।” आज

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संज्ञी

आचार्य श्री विद्यासागर की तत्त्वार्थसूत्र(दूसरे अध्याय) की व्याख्या करते हुए कहते थे… संज्ञी मन सहित होते हैं लेकिन सब मन वाले संज्ञी नहीं होते जैसे

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आत्मा का शरीर छोड़ना

गुरुजन बताते हैं –> किसी भी कर्म के निषेक झड़ना शुरू में अधिक, आगे-आगे कम-कम होते जाते हैं। इसीलिए कथंचित् आगे जाकर इतने कम हो

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प्रथमोपशम

प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन होते समय मिथ्यात्व के 3 टुकड़े सम्यग्दर्शन होने से पहले होते हैं या होने के बाद ? योगेंद्र युगपत। मुनि श्री सौम्य सागर

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दूसरे गुणस्थान में मिथ्यात्व ?

हालांकि मिथ्यात्व पहले गुणस्थान तक ही रहता है परंतु दूसरे गुणस्थान में अनंतानुबंधी के सद्भाव में मिथ्यात्व न होते हुए भी मिथ्यात्व जैसा रहता है।

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मंगल आशीष

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