Category: अगला-कदम
विसंयोजना / उद्वेलना
विसंयोजना अनंतानुबंधी की ही, यह नरक में भी हो सकती है। इसमें 6-7 गुणस्थान से भी असंख्यातगुणी निर्जरा उस समय होती है जब विसंयोजना चल
जीव/पुद्गल विपाकी
जीव – विपाकी… जिसे जीव Direct Feel करें(जैसे घातिया कर्म)। पुद्गल – विपाकी… जैसे शरीर नामकर्म, Feel जीव ही करेगा लेकिन शरीर के माध्यम से,
धन प्राप्ति
धन प्राप्ति पुण्योदय से नहीं, कर्मों के क्षयोपशम से होती है। धन का प्रयोग भी कर्मों (लाभांतराय तथा भोगांतराय) के क्षयोपशम से। मुनि श्री सौम्य
आगम – विज्ञान
श्री राजवार्तिक में आचार्य श्री अकलंक स्वामी ने 1400-1500 साल पहले लिखा था → “शब्द पौद्गलिक है इसलिये उनका संग्रह किया जा सकता है।” आज
संज्ञी
आचार्य श्री विद्यासागर की तत्त्वार्थसूत्र(दूसरे अध्याय) की व्याख्या करते हुए कहते थे… संज्ञी मन सहित होते हैं लेकिन सब मन वाले संज्ञी नहीं होते जैसे
आत्मा का शरीर छोड़ना
गुरुजन बताते हैं –> किसी भी कर्म के निषेक झड़ना शुरू में अधिक, आगे-आगे कम-कम होते जाते हैं। इसीलिए कथंचित् आगे जाकर इतने कम हो
प्रथमोपशम
प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन होते समय मिथ्यात्व के 3 टुकड़े सम्यग्दर्शन होने से पहले होते हैं या होने के बाद ? योगेंद्र युगपत। मुनि श्री सौम्य सागर
दूसरे गुणस्थान में मिथ्यात्व ?
हालांकि मिथ्यात्व पहले गुणस्थान तक ही रहता है परंतु दूसरे गुणस्थान में अनंतानुबंधी के सद्भाव में मिथ्यात्व न होते हुए भी मिथ्यात्व जैसा रहता है।
व्यंजन पर्याय
शुद्ध द्रव्यों में प्रदेशत्व की अपेक्षा व्यंजन पर्याय भी घटित हो सकती है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
सातिशय पुण्य
सातिशय पुण्य क्या है ? प्रिया सातिशय पुण्य मतलब जिसमें अतिशय हो (जैसे मुनी बनना)। यह पुण्यानुबंधीपुण्य के बहुत ऊपर की अवस्था है। मुनि श्री
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