Category: अगला-कदम

गुण / अवगुण

द्रव्य की परिभाषा में गुण + पर्याय है। फिर हमको द्रव्यों में अवगुण कैसे दिखने लगते हैं!! डॉ. ब्र. नीलेश भैया

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आर्यिका माता जी

आर्यिका माता जी की प्रतिमा 11वीं नहीं, 11 के परे होती है। इसीलिए उनको उपचार से महाव्रती कहा जाता है। 11वीं प्रतिमा तो ऐलक, क्षुल्लकों

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मन

मन को कैसे समझें/ नियंत्रण में लें ? मन के विषय बाहरी (कषाय, इंद्रिय विषय) होते हैं, उनको समझें/ उनकी खुराक कम कर दें ।

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क्या पुण्य हेय है ?

पुण्य सर्वथा हेय नहीं (श्रावकों के लिये उपादेय है),ना ही पुण्य का फल हेय है । बस ! पुण्य के फल का दुरुपयोग हेय है।

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देव आयुबंध

आत्मा से साधे (सरागसंयमी, संयमासंयम) –> विशिष्ट पर्याय वैमानिक देव, अगली पर्याय में भी संस्कार लेकर जाते हैं। मन से साधे –> अकाम निर्जरा, पुण्यार्जन।

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क्रम पर्याय

आगम में “क्रम वर्तिनः पर्याय” कहा है यानी एक पर्याय के बाद दूसरी पर्याय क्रम से आती है। जैसे मनुष्य में बालपना, युवावस्था, वृध्दावस्था क्रम

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आहार

लेपाहार → एकेंद्रियों के। कवलाहार → 2-5 इंद्रिय जीवों में। तेजाहार → अंडज जीवों में। नोकर्माहार → 1-13वें गुणस्थान में। कर्माहार → सब में (14वाँ

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लोगों के प्रकार

चार प्रकार के लोग…. 1) भाग्यवान… जिनके पास वर्तमान में धन वैभव हो। 2) सौभाग्यशाली… वैभव के साथ स्वास्थ्य भी अच्छा हो। 3) महा-सौभाग्यशाली… धन,

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वैयावृत्ति

चारित्र की वैयावृत्ति कैसे करें ? अनुमोदना से। आचार्य श्री विद्यासागर जी (स्वाध्याय श्री भगवती आराधना- भाग 1, पृष्ठ 73) सान्निध्य आर्यिका श्री पूर्णमति माता

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पूर्णतावादी

पूर्णतावादी का कोई कार्य कभी पूरा नहीं होता है। क्योंकि उसकी निगाह में कोई भी कार्य सर्वगुण सम्पन्न नहीं होता है। इसलिये जोखिम उठाने के

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मंगल आशीष

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