Category: अगला-कदम

कल्प

कहा गया है कि कल्प पहले से सोलहवें स्वर्ग में होते हैं। तो भवनत्रिक में ? वहाँ देवों में Categories तो होती हैं पर उन्हें

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सम्यग्दर्शन

द्वितीयोपशम सम्यग्दर्शन अनंतानुबंधी की विसंयोजना तथा दर्शनमोहनीय के उपशम से होता है। जबकि प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन में विसंयोजना की जरूरत नहीं। मुनि श्री सौम्य सागर जी

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पंचम गति

ऊपर की परम गति, संयम से सिद्ध( अवस्था)। नीचे की परम असंयम से निगोद।। मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी

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अवगाहना/ आवली

अवगाहना घनफल रूप भी होती है(गाथा 96)। आवली को अवगाहना तथा भाव(गुणाकार रुप) में भी लिया है(गाथा 101)। मुनि श्री सौम्य सागर जी (जीवकांड –

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जघन्य अवगाहना

अपर्याप्तक निगोदिया जीव के शरीर की अवगाहना पहले समय में आयताकार, दूसरे में घनाकार और तीसरे समय में गोल हो जाती है, यही किसी भी

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देवों की गति

देव अगले भव में अग्नि और वायुकायिक जीवों में जन्म नहीं लेते। कारण ? अग्नि और वायुकायिक जीवों में विक्रिया करने की शक्ति होती है

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देश/सर्वघाती कषाय

प्रत्याख्यानावरण कषाय सर्वघाती क्योंकि चारित्र (सकल) नहीं होने देती। संज्वलन देशघाती क्योंकि चारित्र होने देती लेकिन यथाख्यात चारित्र ना होने देने की अपेक्षा सर्वघाती। मुनि

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विसंयोजना / उद्वेलना

विसंयोजना अनंतानुबंधी की ही, यह नरक में भी हो सकती है। इसमें 6-7 गुणस्थान से भी असंख्यातगुणी निर्जरा उस समय होती है जब विसंयोजना चल

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जीव/पुद्गल विपाकी

जीव – विपाकी… जिसे जीव Direct Feel करें(जैसे घातिया कर्म)। पुद्गल – विपाकी… जैसे शरीर नामकर्म, Feel जीव ही करेगा लेकिन शरीर के माध्यम से,

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धन प्राप्ति

धन प्राप्ति पुण्योदय से नहीं, कर्मों के क्षयोपशम से होती है। धन का प्रयोग भी कर्मों (लाभांतराय तथा भोगांतराय) के क्षयोपशम से। मुनि श्री सौम्य

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मंगल आशीष

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