Category: वचनामृत – अन्य

दान

अभक्ष्य खाने वाले को, अभक्ष्य देना दान में नहीं आयेगा। क्योंकि दान तो स्व-पर हितकारी होता है। अभक्ष्य देने में स्व का अहित तो है

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मोह

मोह कम/ समाप्त कैसे होता है ? संसार/ सम्बन्धों को क्षणिक/Temporary मानने, उसका बार-बार चिंतवन करने से। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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मोह

जैसे कीचड़ से कीचड़ नहीं धुल सकती है, वैसे ही मोह से मोह धुलता नहीं है, बल्कि बढ़ता ही है। क्षु. श्री सहजानंद जी

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धोखा

धोखे से कमाये गये धन को पुण्य में लगाने पर पुण्य उसको मिलेगा जिसको धोखा दिया गया था। गुरु गोविन्द सिंह

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घमंड

हम इन्द्रियों का बहुत घमंड करते हैं। कानों से सुने, आँखों से देखे को ही सही मानते हैं। क्षु. श्री सहजानंद जी</span

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धनवान

आचार्य मानतुंग के अनुसार धनवान वह जो अपने धन का उपयोग धनहीनों को धन, पुण्यवानों को आहार दानादि, बराबर वालों को सहयोग प्रदान करता हो।

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अहिंसा / अनुकम्पा

अहिंसा मुनियों के लिये क्योंकि उनके पास अनुकम्पा करने के साधन नहीं होते हैं। अनुकम्पा तो गृहस्थों के लिये होती है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर

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गुरु

गुरु कोई व्यक्ति नहीं शक्ति हैं। जो हमको कभी नज़रों से, कभी आशीर्वाद से और कभी भावनाओं से बिना कहे/ बिना कुछ करे शक्ति देते

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अनेकांत

जितना कीमती हीरा, उतने ज्यादा कोण। ऐसे ही जिस व्यक्ति के जितने ज़्यादा दृष्टिकोण, वह व्यक्ति उतना ही ज़्यादा महान। निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

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मोह / राग

मोह हो तो राग बढ़ता है, राग हो तो मोह। क्षु. श्री सहजानन्द जी

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मंगल आशीष

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