Category: वचनामृत – अन्य
Teacher
T = Talent, E = Education (ज्ञानी), A = Active (जागृत), C = Careful, H = Honest, E = Efficient, R = Regular, ऐसे Teacher
सत् / सत्य
सत् अस्तित्व रूप है। सत्य हमेशा सत् हो आवश्यक नहीं। सत्य धर्म नहीं धर्म तो अहिंसा है, सत्य उसकी रक्षा करता है। निर्यापक मुनि श्री
कन्यादान
कन्यादान को दान की श्रेणी में क्यों नहीं लिया ? दान उसे कहते है जिसमें उपकार का भाव होता है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
पुण्य / पाप
Offence पाप/ हिंसा है, Defence पुण्य/ अहिंसा। मुनि श्री प्रमाणसागर जी
समता
युवा तथा वृद्ध तपस्या में लीन थे। एक देव आये, दोनों ने जिज्ञासा रखी कि हमको मोक्ष कब होगा ? देव… वृद्ध तपस्वी तीन भव
भरोसा
ईश्वर को आखिरी उम्मीद नहीं, पहला भरोसा बनाइये। मुनि श्री अविचलसागर जी
अपेक्षा / इच्छा
अपेक्षा परावलम्बी, इच्छा स्वावलम्बी। इच्छा में अपेक्षा का होना हानिकारक। श्रद्धा में अपेक्षा/ इच्छा नहीं, इसलिये लाभकारी। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
जीना
जीना उसी का नाम है, जिन्होंने जीना (सीढ़ी) बना दिया (मोक्षमार्ग) जैसे आचार्य श्री विद्यासागर जी ने। आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
धर्म
धर्म 2 प्रकार का – व्यक्ति सापेक्ष → सब अपने-अपने भावों को परिष्कृत करते हैं। वस्तु सापेक्ष → वस्तु का स्वभाव ही धर्म है। निर्यापक
अनुकम्पा
दो प्रकार की अनुकम्पा –> सामान्यजन के प्रति अनुकम्पा। साधुजन के प्रति अनुकम्पा। इसमें विशेष पुण्य/ लाभ मिलेगा। Feeling विशेष होगी क्योंकि Object Higher Quality
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