Category: वचनामृत – अन्य
निस्पृहता
आचार्य श्री विद्यासागर जी को बताया –> आप सुबह 3-4 बजे से लेकर रात तक इतनी मेहनत करते हैं, एक गिलास दूध ले लिया करिए,
धार्मिक क्रियायें
टीवी आदि के निमित्त से धर्म खूब हो रहा है, तो धर्म का ह्रास कैसे और क्यों कहा ? जितनी धार्मिक क्रियायें हो रही हैं,
चाहत
हम धनादि/ पुत्रादि से ज्यादा अपने को चाहते हैं। जैसे दर्पण को नहीं, उसमें अपने को देखते हैं, दर्पण को तो निमित्त बना लेते हैं।
मोह
मोह प्राय: निकृष्ट/ लुटेरों/ खचोरों से ही होता है। क्षु. सहजानंद जी (सज्जन लूटेगा/ खचोरेगा नहीं)।
निराकुलता
अतिभाव तथा अतिअभाव दोनों ही आकुलता देते हैं।* समभाव से ही निराकुलता आती है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी *(अति-निर्देश भी)।
अहंकार
अहंकार… राजा भोज के दरबार में एक ज्ञानी ने कोरे कागज़ पर बिना कुछ लिखे बताया कि इस कागज़ पर एक सुंदर कविता लिखी है।
बहुलता
पौधे कम खाद देने पर कम मरते हैं, ज्यादा खाद देने पर ज्यादा। शरीर/ संसार के लिये Excess ज्यादा हानिकारक है। मुनि श्री मंगलानन्द सागर
धर्म / अधर्म
अपराध करना अधर्म। उसका फल सहजता/ स्वीकृति के साथ सहना, धर्म। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
साधु
साधु का घर दूर है जैसे पेड़ खजूर, चढ़े तो मीठे फल चखे, गिरे तो चकनाचूर। मुनि श्री अजितसागर जी
व्यक्तित्व
वर्तमान के क्रियाकलाप मेरे व्यक्तित्व का सही से निर्धारण नहीं कर सकते। मैं क्या नहीं कर पा रहा हूँ, वह सही निर्धारण करेगा। निर्यापक मुनि
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