Category: वचनामृत – अन्य

संसार की ऊर्जा

संसार की ऊर्जा को जीव तथा अजीव दोनों ही ग्रहण कर सकते हैं। जीव द्वारा ग्रहण तो दिखता है। अजीव में जैसे किसी स्थान में

Read More »

सुख / दु:ख

दु:ख पुरुषार्थ करके आता है। सुख बिना पुरुषार्थ किये क्योंकि सुखी रहना तो आत्मा का स्वभाव होता है। मुनि श्री मंगलानंद सागर जी

Read More »

परिग्रह / संग्रह

बाँध में पानी संग्रह किया जाता है, अनुग्रह के लिये। परिग्रह में विग्रह है, आसक्ति है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

Read More »

मरण

संसार तथा परमार्थ में मरण उपकारी है –> घातक बीमारी में, समाधिमरण में, मरण से घरों में जन्म/ संसार चलता है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

Read More »

पाप / पुण्य

पाप का घड़ा छोटा होता है, जल्दी भरकर फूट जाता है। पुण्य का अनंत क्षमता वाला (मोक्ष की अपेक्षा), कभी फूट ही नहीं सकता। निर्यापक

Read More »

भाग्य / पुरुषार्थ

काँटा लग‌ना पूर्व के कर्मों से (तथा वर्तमान की लापरवाही से)। लेकिन रोना/ न रोना पुरुषार्थ का विषय। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

Read More »

साधना

गृहस्थ जीवन जीते हुए साधना कैसे करें ? तुलाराम व्यापारी सामान तौलते समय दृष्टि तराजू पर रखता था। जब तराजू समानांतर हो जाती थी तब

Read More »

निद्रा

निद्रा आने पर ग्लानि का भी भाव रहता है। जैसे निद्रा आने पर मनपसंद भोजन, प्रिय बच्चों में भी रुचि नहीं रहती। मुनि श्री प्रणम्यसागर

Read More »

भाग्य

भाग्य के प्रकार –> 1. सौभाग्य – श्रावक (अच्छे परिवार में जन्मा)। 2. अहोभाग्य – श्रमण (मुनि/ साधु), जिन्होंने सौभाग्य को Encash कर लिया। 3.

Read More »

GOD

“G” से Generator, “O” से Operator, “D” से Destroyer, अपने लिये मैं खुद तीनों हूँ। मुनि श्री मंगलसागर जी

Read More »

मंगल आशीष

Archives

Archives
Recent Comments

January 10, 2025

May 2026
M T W T F S S
 123
45678910
11121314151617
18192021222324
25262728293031