Category: वचनामृत – अन्य

आध्यात्मिकता

जरूरतों को कम, इच्छाओं को दुर्बल करना आध्यात्मिकता है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

Read More »

सेवा

सेवा प्रशंसनीय है, यदि उसमें ममत्व* न हो। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी * धन, प्रतिष्ठा आदि से भी न हो।

Read More »

यंत्र/मंत्र/तंत्र

सृष्टि इन तीनों से ही चलती है। यंत्र, मंत्र हमको मजबूत करते हैं, जंगली पौधे जैसे मुसीबतें झेलता हुआ बढ़ता रहता है। तंत्र (साधन) कमज़ोर/पराधीन

Read More »

धर्म/संकट

धर्म वो नहीं जो संकटों को टाल दे, बल्कि वो जो संकटों में सम्हाल ले। देखा जाए तो धर्मात्माओं पर संकट आते तो है पर

Read More »

सीता

सीता जी पर अत्याचार नहीं, बल्कि ऊँचे स्थान पर बैठाने की प्रक्रिया थी जैसे साधुओं की कठिन साधना। तभी तो आम आदमी सीता राम कहता

Read More »

प्रतिक्रिया

2 मुर्गे लड़ते हैं प्रतिक्रिया के कारण। यदि प्रतिक्रिया न करें तो सामने वाले की स्थिति उस मुर्गे जैसी हो जाएगी जो दर्पण में चोंच

Read More »

धर्म ध्यान

गुरुजन कहते हैं → धर्म ध्यान हर समय करते रहना चाहिए। पर हर समय पूजादि तो सम्भव नहीं ! पूजादि तो धर्म के बाह्य रूप

Read More »

दुःख

हम दुःख नहीं चाहते पर दुःख के साधनों को छोड़ना तो दूर, बढ़ाते/ जमा करते रहते हैं। मुनि श्री शैलसागर जी

Read More »

वरदान

भगवान से कभी यह वर मत माँगना कि मैं अपने बच्चों की हर इच्छा पूरी कर सकूँ। ऐसा वर माँगा, तो धृतराष्ट्र बन जाओगे। निर्यापक

Read More »

इष्ट / अनिष्ट

इष्ट/अनिष्ट स्थायी नहीं रहते। माँ बचपन में इष्ट, शादी के बाद पत्नी फिर बच्चे, वृद्धावस्था में भगवान। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

Read More »

मंगल आशीष

Archives

Archives

June 27, 2026

November 2026
M T W T F S S
 1
2345678
9101112131415
16171819202122
23242526272829
30