Category: वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर

हाइकू

किसान तीन टांग वाले स्टैंड पर खड़ा होकर अनाज से भूसा अलग करता है। ऐसे ही तीन पदों के हाइकू से फ़ालतू शब्द छँट जाते

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संयम

पेट लैटर-बौक्स नहीं है, कि पोस्टकार्ड, लिफ़ाफ़े कुछ भी डालते रहो; जब मर्ज़ी आये तब, कितने भी डालते रहो। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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जमीन से जुड़ना

अंकुर बड़े-बड़े तूफानों में भी नहीं हिलता क्योंकि जमीन से जुड़ा रहता है। बड़े-बड़े वृक्ष छोटे-छोटे तूफानों में हिल जाते हैं/गिर जाते हैं क्योंकि वे

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संस्कार

बच्चों को बड़ों से शिकायत रहती है। होनी भी चाहिये; तभी तो बड़े बच्चों से शिकायत कर सकेंगे। पहले राजा तक अपने बच्चों को सुविधाओं

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सही क्या ?

1. आंखें न मूदो! 2. न ही दिखाओ! 3. सही क्या, देखो! आचार्य श्री विद्यासागर जी 1. स्वयं के प्रति 2. स्वजनों के प्रति 3.

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सपना

दिन का हो या रात का, सपना सपना होय; सपना अपना सा लगे, किन्तु न अपना होय। आचार्य श्री विद्यासागर जी दिन के सपने मोह

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ईर्ष्या

ईर्ष्या क्यों ? ईर्ष्या तो बड़ों से होती है, मैं छोटा क्यों बनूँ ! आचार्य श्री विद्यासागर जी

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संस्कृति और साहित्य

संस्कृति बनाये रखने में समीचीन साहित्य की प्रमुख भूमिका होती है। परन्तु वह साहित्य जीव के लिये उपयोगी होना चाहिये, उसके उपयोग से ही संस्कृति

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सम्भाल

गुरु, रेडिओ की तरह Connection कराके शिष्यों को चलने योग्य बना देते हैं। Fine Adjustment तो शिष्यों को खुद ही करना होता है (भावों में

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मंगल आशीष

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