Category: वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
वासना
वासना का सम्बंध न तन से है न वसन* से, अपितु माया से प्रभावित मन से है । आचार्य श्री विद्यासागर जी * पोशाक
जज / वकील
जज सुनते ज्यादा हैं, बोलते कम, भेद-विज्ञान लगाकर सत्य पकड़ते हैं । फांसी का निर्णय देने के बाद कलम तोड़ देते हैं – अहिंसा का
आत्मा
आत्मा को भार* नहीं, आभार** मानो । * भार मानने वाले आत्मघात तक कर लेते हैं । ** कितना उपकार कि आत्मा हमें मोक्ष-मार्ग पर
संस्कार
दही के बर्तन में बिना जामुन के दूध ऐसा जम जाता है कि जमा (जमाना) उल्टा कर दो तो भी ना गिरे । आचार्य श्री
श्रमण / श्रावक
बिना संयम के काले बाल वालों पर भरोसा मत करना ; Army area में Civilian का जाना वर्जित होता है । श्रावकों की सुनो मत/मानो
परिस्थितियाँ
परिस्थितियों से नहीं, परिणामों से डरो, परिस्थितियाँ तो थोड़े समय के लिये निर्मित होती हैं, परिणाम स्थायी प्रभाव छोड़ते हैं । आचार्य श्री विद्यासागर जी
चित्र
चित्र के साथ जब “वित्त”* जुड़ जाता है तब वह चित्र, विचित्र बन जाता है । आचार्य श्री विद्यासागर जी * जब चित्र(कला) से पैसा
अवगुणों से गुण-ग्राहिता
सामने वाले के गलत क्रम में लगे बटनों को देखकर अपने बटन चैक करना, ताकि हंसी के पात्र न बन जाएं । आचार्य श्री विद्यासागर
दूसरों की चिंता
जिनका स्वाध्याय/धर्म में मन लगता है, उनकी चिंता नहीं/चिंता करने की ज़रूरत भी नहीं । जिनका मन नहीं लगता, उनकी चिंता करने से लाभ नहीं
मातृभाषा
संस्कार मातृभाषा में क्यों ? माँ से जो सीखा, उस भाषा को हेय दृष्टि से देखने लगे, तो माँ को भी उसी दृष्टि से देखने
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