Category: वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर

प्रभु-कृपा

प्रभु के दरबार में कहते हो झोली भर दो, जबकि कहना चाहिये – झोली छुड़ा दो । आचार्य श्री विद्यासागर जी

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जरा / अजर / नजर

जरा* न चाहूँ, अजर** बनूँ, नजर*** चाहूँ । आचार्य श्री विद्यासागर जी * रोग/थोड़ा भी ** निरोगी *** गुरुकी/सम्यग्दृष्टि

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कर्मफल

समय से पहले फल चखने का भाव न करें । क्योंकि अधपका फल स्वादिष्ट नहीं, स्वास्थ्यवर्धक भी नहीं तथा उसमें हिंसा (जीवराशि) ज्यादा । ताप

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सावधानी

वक़्त-वक़्त पर* उन्हें न भूलें… 1) जिनसे बचना है 2) जिनसे संरक्षण होता है 3) जो हमारी प्रगति में बाधक हैं * वक़्त-वक़्त पर –

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दौड़-धूप

दौड़-धूप, यानि धूप में दौड़ना । धूप होती है सीमेंट के जंगलों में । गांवों में सुकून है, वहाँ किसान संग्रह के पीछे नहीं भागता,

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ज्ञान / तप

ज्ञान का अजीर्ण, घमंड । तप का क्रोध । आचार्य श्री विद्यासागर जी

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काया

काया का कायल नहीं, काया में हूँ आज । कैसे काया-कल्प हो, ऐसा हो कुछ काज ।। आचार्य श्री विद्यासागर जी (हम तो आज चाय

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घनिष्टता

छोटा सा कंकड़ भी पानी में डूब जाता है, बड़ा भारी खंबा नहीं, क्योंकि कंकड़ की घनिष्टता ज्यादा होती है । पैसा थोड़ा हो, घनिष्टता

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जीना

जीना है तो जीना चढ़ जाओ, वरना जीना छोड़ दो । आचार्य श्री विद्यासागर जी

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मंगल आशीष

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