चिड़िया की तलाश

मुनि क्षमा सागर जी को
समर्पित

एक चिड़िया
अब खोजती है उसे
जिसके कमरे में
उसने अपने बच्चे बड़े किये थे।
जब वो था,
तब वो सोचती थी
ये आदमी
यहाँ से चला जाये,
और
कहीं और जाकर जिये
ताकि मैं, और मेरा बच्चा
यहाँ सुकून से रह सकें।
अब वो आदमी
कहीं दूर चला गया है,
तो
अब वो
चिड़िया उदास है।
क्योंकि अब
उस पर
कोई गीत नहीं लिखता,
और
न कोई अब उसके लिए
तराने ही गुनगुनाता है।
अब उदासी ही
बस उसके आसपास है,
और अब बस ऐसे ही,
उसका जीवन
बीता जाता है।
वो चाहती है
वो फिर आये,
और उस पर
गीत लिखे..
जिसमें वो हो
उसका बच्चा हो
और आसमान
और एक नदी भी हो।
हों बहुत से पेड़, और घरोंदे
कुछ सीढ़ियां
कुछ कदम, कुछ पत्थर
एक देवता, कुछ पुजारी
और कुछ यति भी हों।
चिड़िया
मुझसे पूंछ नहीं पाती,
और मैं उससे कह नहीं पाता,
कि..
अब ये कमरा कभी नहीं भरेगा।
कि… इसकी धूल भी
अब कभी साफ नही होगी
क्योंकि
इसका देवता,
अब कभी न आने को
कहीं चला गया है।

– निःसंग बन्धु (ब्र. नीलेश भैया)

बिना शांत हुए दूध की परिणति नहीं बदलती*,
आत्मा की कैसे बदल सकती है !
शांति पाने का उपाय – धर्म/वीतरागता।

मुनि श्री महासागर जी

* दूध की परिणति दही बनकर ही बदलती है और दही के लिए दूध को ठंडा/ शांत होना होगा।

जीवन-यात्रा को सुखद वैसी ही बनायें जैसे सड़क-यात्रा को बनाते हैं-
1. भीड़ भरे शहरों से बचने, Bypass का प्रयोग
2. Bump आने पर Speed कम करके
3. ग़लत जाने पर “U” Turn लेलें

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

जल से ही पैदा हिमखंड (तरल से कठोर), मान के कारण जल के ऊपर/सिर पर ही रहता है, बड़े बड़े जहाजों के विध्वंस में कारण बन जाता है।
पूंछ (हमारी पूंछ हो/सब पूंछें) वाली मूंछ तो महिलाओं में भी पायी जाती है।

निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

दक्षिण में शिक्षा को “दंड” देना कहते हैं यानि जो उदंड को डंडे से अनुशासित करे पर कुम्हार के घड़े बनाने जैसा अंदर हाथ रखकर।
शिष्य संयम रूपी आग से नहीं, राग से डरता है।
शिक्षक तो दर्पण है उसके प्रति अर्पण/समर्पण सब छोटे हैं।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

भाग्य, कर्म-भूमि की दुनिया में खाका देता है,
उसमें रंग पुरुषार्थ से भरा जाता है (अच्छा/ बुरा, पूरा/ अधूरा)।

स्वामी विवेकानंद जी

(प्रियजनों का मिलना भाग्य से यानि खाका मिलना।
उनसे अच्छे/ बुरे सम्बन्ध बनाना/ बनाये रखना, पुरुषार्थ से….जया)

एक कलैक्टर ने महाराज जी से साम्प्रदायिक/राजनैतिक समस्याओं के लिये दिशा-निर्देश मांगा।
महाराजा रणजीत सिंह का संस्मरण सुनाया – ताज़िया ऊंचा था, बरगद की शाखा अड़ रही थी। दोनों सम्प्रदायों के लोग आमने-सामने आ गये।
राजा ने गड्ढा खुदवाया, ताज़िया गड्ढे में से निकल गया, शाखा भी नहीं काटनी पड़ी।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

“भा” से ज्ञान जैसे सूर्य प्रकाश/ज्ञान का प्रतीक सो भास्कर।
“रत” रमण करना/आनंद लेना।
भारतीय – जो ज्ञान/ आध्यात्म में रमण/ आनंद लेते हैं।

राधाकृष्ण पिल्लई

आप हर समय आल्हादित कैसे रह लेते हैं ?
मैं क्यों नहीं रह पाता ? ————————- एन.सी.जैन-नोएडा

क्योंकि जो तुम्हारे पास* है, वह मेरे पास नहीं है।
जो तुम्हारे पास नहीं है, वह मेरे पास** है।

चिंतन

* धन/ वैभवादि
** निश्चितता

गुण अवगुण सब में होते हैं।
महत्त्वपूर्ण है कि पहली दृष्टि हमारी गुणों पर पड़ती है या अवगुणों पर। यदि गुणों पर है तो हम गुणग्राही होंगे, अपने गुणों की वृद्धि करेंगे।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

पक्षी ऊंचाइयाँ पाने बारी-बारी से दोनों पंखों को ऊपर नीचे करता है, दोनों को बराबर महत्त्व देता है।
यदि एक पंख को ही ऊपर नीचे करता तो नीचे गिर पड़ता।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

जज दोनों पक्षों को निष्पक्ष सुनता है इसीलिए ऊपर बैठता है,
वकील एक पक्ष की बात करता है सो नीचे खड़ा रहता है।

चिंतन

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