आत्मा की बात सुनने के लिये संस्कार आवश्यक होते हैं।
जैसे इंजेक्शन लगाने के लिये स्प्रिट।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
दोनों ख़ुद गिर सकते हैं (समय के साथ निर्जीव),
दोनों दूसरों को भी गिरा सकते हैं (निर्जीव जैसे जंग, लोहे को)….निकृष्ट।
पर सजीव बन भी सकता है।
निर्जीव स्वयं नहीं बन सकता, उसे सजीव की सहायता लेनी होगी।
सजीव यदि दूसरों को भी सुधारेगा तो महान जीव, जैसे गुरु/भगवान।
चिंतन
टेकड़ी गांव के एक परिवार में 58 सदस्यों में एक चूल्हा।
संगठन का रहस्य जानने एक पत्रकार घर के बड़े सदस्य के पास पहुँचा तो उन्होंने छोटे के पास भेजा, छोटे ने बड़े के पास।
रहस्य था – एक दूसरे की इज्ज़त और विश्वास।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
स्वाभिमान…. पद की गरिमा बचाये रखने की सावधानी।
अभिमान…… मान की चाहना।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
उपवन को सुंदर बनाये रखने के लिये सड़े/ सूखे/ असुंदर पत्तों को हटाना होता है।
ऐसे ही जीवन में से सड़ी गली आदतों को हटा दें तो क्या जीवन सुंदर नहीं बन जायेगा !
चिंतन
- धर्म प्राप्ति के लिये विशेष प्रयत्न, प्रभावना है।
- भावना अच्छी हो तभी प्रभावना होती है।
- व्रतों तथा सादगी का प्रभाव प्रभावना पर अवश्य पड़ता है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
प्रसिद्धि और विवाद एक दूसरे के पूरक हैं।
मुनि श्री सौम्यसागर जी
कैसी विडम्बना है –
Welcome Drink में नकली नींबू का रस डाला जाता है।
और हाथ धोने (Finger bowl) के लिये असली नींबू!!
(अरविन्द)
- खम्मामि सव्वजीवाणां, सव्वे जीवा खमन्तु मे।
मैं पहले सब जीवों को क्षमा करता हूँ और अपेक्षा रखता हूँ कि सब जीव मुझे भी क्षमा करें। - जैसे अपने अपराध के लिये दूसरों से क्षमा चाहते हैं,
क्या दूसरे से अपराध होने पर ऐसी ही क्षमा हम अपने भीतर भी धारण नहीं कर सकते ?
मुनि श्री क्षमासागर जी
- जब हम आत्मानुराग से भर गये हों, देहासक्ति से ऊपर उठ गये हों, वहीं ब्रह्मचर्य है।
- परिणामों की अत्यंत निर्मलता का नाम ब्रह्मचर्य है।
मुनि श्री क्षमासागर जी
अब कुछ करना नहीं,
अब तो भावना और उपाय/साधना के फल आने शुरु हो गये, भरेपन का भाव आने लगा है।
सहारे की भावना बुरी है, सहारा देना और लेना बुरा नहीं।
असली परीक्षा तो अभाव में ही होती है।
एक साधू को राजा ने अपने महल में सुलाया, सुबह पूछा-नींद कैसी आयी ?
साधू- कुछ तेरी जैसी, कुछ तेरी से अच्छी (आरामदायक, पर आदत नहीं डाली)
मुनि श्री क्षमासागर जी
न मेरा, न तेरा, जग इक रैन बसेरा।
अवगुणों को छोड़ने का मन बना लें, उन्हें ग्रहण न करें, इसी का नाम त्याग है।
मुनि श्री क्षमासागर जी
- विषय-भोग जीवन को मुश्किल में डालते हैं।
- तपस्या मुश्किल में नहीं डालती । तपस्या तो जीवन को आसान बना देती है।
- जिसके मन में निरन्तर इच्छाएँ उठ रही हैं, उसका मन कभी नहीं भरता, वह तप नहीं कर सकता।
मुनि श्री क्षमासागर जी
अपने मन-वचन और इन्द्रियों को संयमित कर लेना, नियमित कर लेना, नियन्त्रित कर लेना, इसी का नाम संयम है।
यदि हमने अपने जीवन में सत्य-ज्योति हासिल कर ली है तो हमारा दायित्व है, हमारा कर्तव्य है कि हम उस पर संयम की एक चिमनी भी रख दें जिससे वह सच्चाई की ज्योति कभी बुझ नहीं पाये।
मुनि श्री क्षमासागर जी
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