संकल्प बुद्धि से लिया जाता है, पर मन संकल्प लेते ही पुराने संस्कार नहीं छोड़ पाता है।
पीपल की गुणवत्ता बढ़ाने के लिये उसे 64 पहर तक धैर्यपूर्वक कूटा जाता है;
ऐसे ही बुद्धि और मन को एकमेव करने के लिए बहुत पुरुषार्थ करना पड़ता है, वरना दोनों में द्वंद/अशांति बनी रहती है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

कम प्रकाश में घड़ी में समय नहीं दिखता। दृष्टि को सुइयों पर केन्द्रित करें, तो समय का पता लग जाता है।

कम या ज़्यादा प्रकाश भाग्य से होता है; दृष्टि को सही बिन्दु पर केन्द्रित करना पुरुषार्थ से।

नासिकाग्र पर दृष्टि केंद्रित करने पर समय (आत्मा) का पता लग जाता है।

चिंतन

60 लाख की कार की कीमत जब 60 रुपये वाली खिलौना कार के बराबर मानोगे, तभी Enjoy कर पाओगे, वरना उसकी सीट से प्लास्टिक कवर उतार नहीं पाओगे।
हर वह चीज़ जो खरीदी जा सके, खिलौना ही तो है, कोई 60 लाख का कोई 60 रुपये का।

(अरविंद)

शिष्य – इच्छा क्या है ?
गुरु – जो कभी न पूरी हो, और एक-आध पूरी हो भी जाए, तो दूसरी पैदा हो जाए; प्राय: आशा के विपरीत फल आयें।

मुनि प्रमाण सागर जी

रावण ने बहुरूपिणी विद्या सिद्ध कर ली थी। राम रावण के एक रूप को मारते थे, तभी उसके अनेक रूप पैदा हो जाते थे।
इच्छा भी ऐसी ही होती है: एक समाप्त होते ही अनेक इच्छाएं पैदा हो जाती हैं।

चिंतन

कड़वी गोली चबायी/मुंह में ज्यादा देर रखी नहीं जाती है, निगल ली जाती है । तब वह मुंह का रस खराब करने की बजाय फायदा करती है/कीटाणुओं (कर्म के) को मार देती है।

(कुरुप भाई)

एक जंगल में बांसों के संघर्षण की आवाज़ अग्नि में बदल गई।
गाँव से भी वैसी ही आवाज आ रही थी। यह मथनी की आवाज़ थी। इसमें आग नहीं, नवनीत निकला।
यह संघर्षण नहीं, मंथन था। इसमें एक छोर खींचा जाता, तो दूसरा ढीला छोड़ा जाता था।

मुनि प्रमाणसागर जी

ख़ाली (ग़रीब) को भरोगे तो दिखेगा (फल); संतोष होगा; पुण्य बंध होगा।
उसका तो पापोदय है; तभी तो ख़ाली है। तीव्र पापोदय में उसका भला न भी हो, पर तुम्हारा भला अवश्यंभावी है।

मुनि श्री सुधासागर जी

अब मोबाइल नं. के पहले “0” लगाने की ज़रूरत नहीं।
अगर Memory में पड़ा है तो हर्जा क्या है/ delete करने का क्या फायदा ?
हर्जा है, ये निरर्थक Zeros सार्थक Memory घेर रहे हैं।
ऐसे ही नाक में ऊँगली डालते रहना/ पैर हिलाते रहना, निरर्थक क्रियायें हैं – Wastage of Energy/अभद्र क्रियायें हैं।

चिंतन

3 प्रकार के –
1. परमात्म सत्य – जो परमात्मा को जानता है
2. आत्म सत्य – जो आत्मा को जानता है
3. संसार सत्य – जो संसार को जानता है

मुनि श्री सुधासागर जी

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