सबसे बड़ा कृपण वह है जो कृपा न माने।

चिंतन

दूध, दही, मक्खन व घी का जन्म एक ही कुल में, पर कीमत अलग अलग।
कारण ?
श्रेष्ठता कुल में पैदा होने से नहीं बल्कि सद्कर्मों/स्थिरता तथा तपने से आती है।

(सुरेश)

पूजा गुणानुवाद है, भक्ति गुणानुराग – भगवान/गुरु व उनके गुणों से।
भक्ति श्रद्धा का बाह्य रूप है पर इससे आंतरिक प्रेम उत्पन्न करता है।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

जो कर्मसिद्धांत पर विश्वास करते हैं, उन्हें पुनर्जन्म पर विश्वास करना ही होगा।
वरना इस जन्म के अंत समयों में किये गये कर्मों का फल कब और किस जन्म में भोगोगे ?

चिंतन

पनही* पशु के होत हैं, नर के कछू नहीं होत।
नर यदि नर-करनी करे, तब नारायन होत।

*जूता (पशु की खाल का)

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

एक सूर्य का प्रकाश है जो सदैव एक सा रहता है जैसे भगवान का ज्ञान।
दूसरा सूर्य के आगे आये बादलों से छन कर आया प्रकाश है, जो कम ज्यादा होता रहता है जैसे विज्ञान का।
ऐसे ही दोनों ज्ञानों में फ़र्क जानना।

चिंतन

इस काल में तो मुक्ति नहीं, तो धर्म क्यों करें ?
लाइन में तो लग लें !
पर लाइन में लग कर क्या करोगे, जब खिड़की बंद है !
दोषों/ दुर्बलताओं/ आकुलताओं से मुक्त्ति तो आज भी है,
धर्म प्रलोभन के लिये नहीं, आत्मकल्याण के लिये करें।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

लुहार सुबह अग्नि को पूजता है ।
बाद में उसी अग्नि को घन से पीटता है ।
कारण ?
सुबह अग्नि एकाकी रहती है, बाद में वह लोहे की संगति में आ जाती है, सो घनों से पिटती है ।
एकाकी आत्मा पूज्य होती है पर कर्मों की संगति में आकर संसार में दुखी/भटकती रहती है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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