बहुत लोग तुम्हें जानते हैं; इससे मान की अनुभूति होगी।
तुम बहुत लोगों को जानते हो; इससे आनंद की अनुभूति होगी।
(सुमनलता – दिल्ली)
सृष्टि अधूरा देती है; पुरुषार्थ से हमको पूर्ण करने को कहती है,
जैसे…
बीज दिया, फ़सल किसान उगाये;
मिट्टी दी, घड़ा कुम्हार बनाये;
इन्द्रियां दीं, उपयोग हम पर छोड़ा।
नाई, दर्जी, सभी पसंद पूछकर आगे की क्रिया करते हैं, सृष्टि भी।
मुनि श्री सुधासागर जी
आर्यिका श्री विज्ञानमती माताजी को आहार में इडली में तोरई डालकर दी गयी, पर उन्होंने उसे ग्रहण नहीं किया।
कारण ? दोनों चीज़ें भक्ष्य थीं, फिर भी नया स्वाद तो बन गया!
अंजू – कोटा
वैभव हमेशा परिग्रह ही नहीं, अनुग्रह* भी है।
*Grace
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
मनुष्य जागते में भी गिर जाते हैं; पक्षी सोते में भी नहीं।
कारण ?
पक्षी अपनी मर्यादा कभी नहीं छोड़ते; जबकि मनुष्य मर्यादा तोड़ने में अपनी शान मानते हैं।
मुनि श्री प्रमाणसागर
किसान तीन टांग वाले स्टैंड पर खड़ा होकर अनाज से भूसा अलग करता है। ऐसे ही तीन पदों के हाइकू से फ़ालतू शब्द छँट जाते हैं; भाव बचा रहता है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
सब सही कहना सही नहीं। समग्रता से, दूसरे के दृष्टिकोण से देखना अनेकांत है।
गांधी जी ने कहा था, “मैं अपने दुश्मनों को भी अपना मित्र मानने लगा हूँ; क्योंकि अब मुझे दूसरों की दृष्टि से अपने को देखने की समझ आ गयी है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
मित्र ढाल होता है – – –
सुख में पीछे,
दु:ख (युद्ध) में आगे।
आइने के सौ टुकड़े करके मैंने देखे हैं।
एक में भी अकेला था, सौ में भी अकेला।
मुनि श्री महासागर जी
आलोचन से
लोचन खुलते हैं ;
स्वागत करें।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
संस्कार देने की चीज़ नहीं, जगाये जाते हैं ।
उन्हें बनाये रखने के लिये, सुसंगति दी जाती है ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
क्या इतने सालों में हम राजनीति/ धर्मादि के क्षेत्रों में पूर्वाग्रह की बेड़ियां तोड़ पाये हैं ?
अपनी मान्यताओं को मानने की मनाही नहीं है पर विपक्ष से द्वेष/घ्रणा करने की स्वतन्त्रता कैसे लेली ?
चिंतन
धर्म: स्वमुखी/आत्ममुखी, निश्चय, परमार्थ में जीना सिखाता है।
नीति: प्राणमुखी, व्यवहार, संसार में जीना सिखाती है।
मुनि श्री सुधासागर जी
किसी वस्तु पर ध्यान केंद्रित करना….
तो क्या अच्छी, बुरी किसी भी वस्तु पर ध्यान लगा सकते हैं ?
जब बच्चा होने वाला होता है, तब सुंदर और स्वस्थ बच्चे का फ़ोटो क्यों लगाते हो? बीमार और कुरूप बच्चे का लगालो!
इसीलिये ध्यान भगवान, गुरु या अपने शुद्ध आत्म स्वरूप पर लगाया जाता है, अशुद्ध चीज़ों पर नहीं; वरना अशुद्ध बनोगे।
चिंतन
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