1. तामसिक – दूसरों को सताने – मरणांतक
2. राजसिक – अहंकार पुष्टि – दीर्घकाल
3. सात्विक – दूसरों की भलाई के लिये – अल्पकाल
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
हर नुकसान, नुकसान करके ही नहीं जाता, फायदा भी कर जाता है जैसे सिर में चोट लगने पर खून निकलना।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
शब्दों में क्या,
आत्मा में अर्थ छिपा,
कौन सोचता!
आचार्य श्री विद्या सागर जी
पं. बनारसीदास जी मुनियों की नकल करके 3 दिन तक कमरे में अकेले ध्यान करते रहे (गृहस्थों के आवश्यक कर्त्तव्य छोड़कर )
इस अनुभव को कहते हैं – ऊंट की सवारी, न आगे बैठ पाये न पीछे की ओर।
मुनि श्री सुधासागर जी
संसार के कानून मनुष्य ने बनाये, धर्म के किसने ?
ज़हर खाने से मरण की सज़ा, शाश्वत/ अनादि से/ प्राकृतिक नियम है।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
पूरे दिन घने बादल छाये रहे, भानु के अस्तित्व का भी भान नहीं हो रहा है, उस जैसा प्रतापी भी मुंह छिपाये बैठा है ।
कर्म जब घनघोर छा जायें, तब शांत बैठकर धर्मध्यान करना ही समझदारी होती है ।
चिंतन
1. चुनाव लड़ना नहीं है लेकिन कौन जीते/हारे, इसे लेकर आपस में लड़ाई क्यों ? क्या इससे पापबंध नहीं होगा !
2. जानवरों को मारना नहीं चाहते पर क्या चमड़ा/ सिल्क/ सच्चे मोतियों का प्रयोग करके हिंसा को प्रोत्साहित नहीं कर रहे ?
ऐसी तमाम असावधानियों से हम बहुत से पापबंध करते रहते हैं, जिनसे बचा जा सकता है/ बचना चाहिए।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

(Smt. Ekta)
मशीन से कपड़ा Defective निकल रहा है, तो सुधारोगे मशीन को या कपड़े को?
सुधारना तो बिगाड़ने वाले को ही चाहिये।
बच्चों को संस्कार पति/पत्नि बनकर नहीं, माता/पिता बनकर ही दिये जा सकते हैं।
मुनि श्री सुधासागर जी
कड़क सर्दी में आचार्य श्री विद्यासागर जी सहजता से सारी क्रियायें करते हैं ।
पूछने पर श्री धवला जी की गाथा सुनाते हैं – “वेदना परिणाम: प्रतिक्रिया” यानि वेदना पर ध्यान देने से वेदना बढ़ती है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
बड़े लोगों में प्राय: अभिमान देखा जाता है, फिर भी उनका वैभव/नाम कम क्यों नहीं होता ?
एक बार बड़ी कमाई (पुण्य) कर लेने पर छोटे छोटे नुकसानों का प्रभाव दिखता नहीं/ प्रभावित नहीं करता ।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
पैसा मानव जीवन की सबसे ख़राब खोज है,
पर मानव के चरित्र को परखने की सबसे विश्वसनीय सामग्री ।
(अनुपम चौधरी)
वृद्धावस्था में शरीर असुंदर क्यों हो जाता है ?
ताकि अब तो शारीरिक आकर्षण छोड़ कर आत्मा की ओर आकर्षित होना शुरु करो ।
बीमारियों का घर क्यों बन जाता है ?
ताकि शरीर के प्रति वैराग्य जगे, इस पर्याय से छूटते समय दु:ख ना हो ।
चिंतन
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