भगवान, धर्म गुरु, शास्त्र, कुल, जाति, देश सब सच्चे चाहिये, भक्त (मैं)?
कुंडली तो दोनों की समान होनी चाहिये न!
मुनि श्री सुधासागर जी
आज के दिन दो महान ईमानदार व्यक्तियों के जन्मदिन के उपलक्ष में ….

(Pranshi Jain)
संस्मरण ….
गणित की कक्षा में गणित की पुस्तक पढ़ने पर शिक्षक पीटते थे – “गणित पढ़ा नहीं जाता, उसका अभ्यास किया जाता है/ Problem solve की जाती हैं ।”
गौरव जैन-भोपाल
(धर्म और Moral Value भी)
सबसे बड़ा अंधकार – मूर्छा
आचार्य महाप्रज्ञ जी
(इसका प्रतिकार ज्ञान ।
बाहर तो बहुत कृत्रिम प्रकाश बढ़ रहा है पर अंदर का अंधकार भी उसी अनुपात में बढ़ा है ।
अधर्म का प्रतिकार भी धर्म से ही संभव है)
उस एक के लिये बहुत दु:खी होते हैं, जो हजारों प्रार्थनाओं के बाद भी नहीं मिलता।
पर उन हजारों से सुखी नहीं होते, जो एक भी प्रार्थना के बिना हमको मिला है।
सड़क लगातार सीधी नहीं बनी रहती, हलके/ खतरनाक मोड़/ चढ़ाई भी आती रहती है, यदि धैर्य तथा सावधानी पूर्वक चलते रहे तो मंज़िल पर अवश्य पहुँच जाते हैं ।
भाग्यशाली वह नहीं जिसके पुण्य का उदय चल रहा है, बल्कि भाग्यशाली वह है जो पुण्य के उदय में पुण्य कर रहा है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
न्यायालय – जहाँ एक अपराध भी नज़र अंदाज़ ना हो ।
जिनालय – जहाँ एक अपराध पर भी नज़र ना पड़े ।
पार्श्वनाथ भगवान पर जब उपसर्ग हुआ तो उन पर छत्र लगाने सबसे पुण्यहीन आये, जो पिछले जन्म में सांप थे (सांप इतना पुण्यहीन होता है कि उसे देखते ही, प्राय: लोग मारने दौड़ते हैं) |
मुनि श्री सुधासागर जी
जब तक अपने को शरीर मानते रहेंगे, संसारियों से सम्बंध बने रहेंगे, प्रगाढ़ होते रहेंगे ।
जब आत्मा मानने लगोगे तब परमात्मा से… ।
चिंतन
“I have many problems in my life.
But my lips don’t know that”.
They just keep smiling.” ― Charlie Chaplin
(Manju)
सागर आते समय एक वृद्धा आचार्य श्री विद्यासागर जी के पैर धोने लुटिया में जल लेकर भीड़ में से निकलकर आचार्य श्री की ओर बढ़ी ।
कार्यकर्ताओं ने रोक कर उसे पीछे कर किया तो लुटिया का जल आचार्य श्री के चरणों में जा गिरा ।
आचार्य श्री – भक्त्ति का प्रवेश हर जगह/परिस्थिति में हो ही जाता है।
संसार-मार्ग पर टिक नहीं सकते, पर टिकना चाहते हो !
मोक्ष-मार्ग पर टिक सकते हैं, पर टिकना नहीं चाहते हो !!
मुनि श्री महासागर जी
- पर्युषण पर्व के 10 दिनों में जो विशुद्धता आयी, उससे क्षमा के भाव बनते हैं।
- सही तरीका तो यह है कि जिनसे पिछ्ले दिनों में बैर हुआ है, उनसे बुजुर्ग लोग मन मुटाव को दूर करायें या हम स्वयं अपने मन मुटाव को दूर करें।
- श्री रफी अहमद किदवई (केन्द्रिय मंत्री) की अपने मित्र से नाराजगी हो गयी, मित्र ने अपने लड़की की शादी में उन्हें नहीं बुलाया पर वे अपने परिवार सहित उपहार लेकर पहुँच गये और मन मुटाव सौहार्द में बदल गया।
- क्रोध कम समय के लिये होता है,
बैर लंबे समय के लिये होता है ।
गुरुजन कहते हैं कि बैर क्रोध का अचार है।
- जो कर्म पूरब किये खोटे, सहे क्यों नहीं जीयरा।
आचार्य श्री विद्यासागर जी नित्य प्रवचन में कहते हैं जो मेरा अपकार कर रहा है वह (आत्मा) तो दिख नहीं रहा है,
जो दिख रहा है (शरीर) वह अपकार कर नहीं सकता।
तो मैं बुरा किसका मानूं ?
- धर्म की अनुभूति के लिये सबसे पहले बैर आदि दूर करने होंगे।
पं. रतनलाल बैनाड़ा जी – पाठ्शाला (पारस चैनल)
- क्षमा भाव मन में रमें,
सत्य सरलता साथ,
शुभ मंगलमय जीवन में,
प्रभु भक्ति के भाव ।
माँ ( श्रीमति मालती जी)
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