मोक्षमार्ग दो ही हैं ।
1. साधना
2. आराधना

जब तक साधना नहीं कर पा रहे हो, तब तक आराधना तो करो ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

3 प्रकार की बुद्धि—
1) सात्विक – करनी/अकरनी, पाप/पुण्य का भेद करे।
2) तामसिक – अधर्म को धर्म, अकर्त्तव्य को कर्त्तव्य माने।
3) राजसिक – (अपने मद में) सही/गलत का भेद नहीं कर पाये।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

अंध-विश्वास से शुरुवात घातक होती है।
विश्वास करने से पहले विचार/ ज्ञान/ विवेक लगायें।
अंत में तो विश्वास को अंधा होना ही पड़ता है यानि अन्य की तरफ से अंधे, तभी पूर्ण समर्पण संभव है।
यह अंध-विश्वास का सकारात्मक पहलू है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

साधु/ व्रती सदैव याद रखें >>
दीक्षा अपने बल/भरोसे पर ली जाती है, औरों/समाज के बल पर नहीं।
व्रती को अपने व्रतों के नियंत्रण में रहना चाहिये, समाज के नियंत्रण में नहीं।
इसके लिये साधु को गृहस्थों से दूरी बना कर रखना चाहिये।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

हाइकु ….
“पाँचों* की रक्षा मुट्ठी** में,
मुट्ठी बंधी, लाखों की मानी”

आचार्य श्री विद्यासागर जी

एकता – सहयोग, समन्वय, समादर, संरक्षण से आती है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

* 1) उँगलियाँ
2) इंद्रियां
3) परमेष्ठी
** प्रण/ शपथ लेते समय की मुद्रा।

सम्बंध शौक नहीं, मजबूरी है, संसारी जीवों के लिये ।
जब मजबूरी है तो झुककर निभाओ भी ।
सम्बंध जब टूटते हैं तो बैर बन जाते हैं ।
सम्बंध न बनें तो रोना, बन जाय तो रोना ।

मुनि श्री सुधासागर जी

मुनि श्री प्रमाणसागर ने किसी विषय पर आचार्यश्री से कहा – “ये मन को अच्छा नहीं लग रहा”
आचार्यश्री – मैने दीक्षा आत्मा को अच्छा बनाने को दी है न कि मन को अच्छा लगने को ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

संसार में ठगा, धर्म में आता है, धर्म में ठगा कहाँ जायेगा ?
लौकिक में ठगा धनादि खोता है पर अलौकिक जन्मजन्मान्तर खो देता है ।
तो क्या करें ?
या तो ख़ुद को सही की पहचान करने का ज्ञान हो वरना सच्चे गुरु के दिशा निर्देश में चलो ।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

वासना का सम्बंध न तन से है न वसन* से,
अपितु माया से प्रभावित मन से है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

* पोशाक

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