

- तप प्रकाशन के लिये नहीं ,प्रकाशित करने के लिये होना चाहिये, आत्मा को प्रकाशित करने के लिये ।
- मोक्ष साधन वाले नहीं जाते ,साधना वाले ही जाते हैं ।
- बिना तपे धातु शुद्ध नहीं होती तो आत्मा कैसे शुद्ध कैसे हो सकती है ?
मुनि श्री विश्रुतसागर जी
- अचेतन तो सिर्फ बाह्य तप से शुद्ध हो सकता है पर चेतन को शुद्ध करने के लिये चेतनता /श्रद्धा चाहिये ।
चिंतन

- अपने मन-वचन और इन्द्रियों को संयमित कर लेना, नियमित कर लेना, नियन्त्रित कर लेना, इसी का नाम संयम है।
- यदि हमने अपने जीवन में सत्य-ज्योति हासिल कर ली है तो हमारा दायित्व है, हमारा कर्तव्य है कि हम उस पर संयम की एक चिमनी भी रख दें जिससे वह सच्चाई की ज्योति कभी बुझ नहीं पाये।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

- जिसका मन जितना सच्चा होगा उसका जीवन भी उतना ही सच्चा होगा ।
- जीवन उन्हीं का सच बनता है जो कषायों से मुक्त हो जाते हैं ।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी


उत्तम शौच ( लोभ न करना ) :-
अपन आनन्द लें उस चीज़ का जो अपने को प्राप्त है ।
लेकिन जो अपने पास है वह दिखता नहीं, जो दूसरों के पास है हमें वह ही दिखता है।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी


- आर्जव धर्म , मायाचारी का उल्टा यानि सरलता ।
- मायाचारी व्यक्ति प्राय: साँप जैसा होता है, ऊपर से सुंदर और चिकना, पर अंदर से ज़हरीला और पकड़ में ना आने वाला ।
- आज कपट जीवन के हर खेल में घुसपैठ कर चुका है, यहाँ तक कि धर्म में भी ।
- कपट से हानि –
1. अविश्वसनीयता।
2. कभी ना कभी पकड़े जाते हैं और फिर ज़िंदगी नरक बन जाती है ।
3. शास्त्रानुसार अगले जन्म में जानवर बनते हैं ।
- जीवन से कपट कैसे दूर करें ?
1.स्पष्टवादी बनें ।
मन में होय सो वचन उचरिये, वचन होय सो तन सो करिये ।
2. जीवन में सादगी लायें, अपनी आवश्यकतायें कम करें।
3. आत्मचिंतन करें – आत्मा का रूप शुद्ध है ।
4. अच्छे शास्त्रों का अध्ययन करने की आदत डालें ।
5. अपनी संगति ऐसे लोगों से रखें जो भौतिकवाद की दौड़ में ना हों ।
पं. रतनलाल बैनाड़ा जी – पाठ्शाला (पारस चैनल)

मान निम्न रूपों में आता है…
अहंकार
तिरस्कार
ईर्षा भाव के रूप में
क्या मान करना स्वाभाविक नहीं है ?
नहीं, अज्ञानता का परिणाम है ।
अपनी प्रशंसा, दूसरों की निंदा करना भी मान का ही रूप है ।
मान को अपने जीवन से हटाने के लिये दूसरों के गुणों की प्रशंसा करें, अपने दोषों को देखें, सोचें की आत्मा के अनंत गुण हैं, मुझमें अगर थोड़े से गुण आ गये तो मैं इसमें इतरा क्यों रहा हूँ !
और ज्ञाता दृष्टा बनकर रहें, हम सब अपने जीवन में विनयशीलता लायें और मान को हटायें ।

आज का दिन क्षमा का है ।
धर्म की शुरूआत क्षमा से ही होती है –
सब जीवों को मैं क्षमा करता हूँ, सब जीव मुझे क्षमा करें ।
शुभकामनायें कि हम सब यह पर्व पूरी क्षमता और उत्साह से मनायें ।
जिन-जिन वस्तुओं/ सुविधाओं की कमी में श्रावक दु:खी होता है,
गुरु उन-उन के अभाव में सुखी रहकर दिखाता है ।
मुनि श्री सुधासागर जी
जलाशय के किनारे बड़े पेड़ भी सूखने लगते हैं ।
(परिग्रही आसपास वालों को भी पनपने नहीं देते)
आचार्य श्री विद्यासागर जी
तपस्वी का रूप मंगलकारी होता है और यदि सुंदरता भी हो तो सोने में सुहागा जैसे आचार्य श्री विद्यासागर जी का ।
शरीर को समय पर उचित भोजन देना अहिंसा है,
जैसे किसान असाढ़ की बरसात में बुवाई करने से नहीं चूकता है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
सामान्यत: घर में कचरा दिखायी नहीं देता है पर झाड़ू लगाने पर दिखने लगता है ।
ऐसे ही, आत्मनिरीक्षण करने पर दोष दिखने लगते हैं ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी

(मंजू)
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