जिनका स्वाध्याय/धर्म में मन लगता है, उनकी चिंता नहीं/चिंता करने की ज़रूरत भी नहीं ।
जिनका मन नहीं लगता, उनकी चिंता करने से लाभ नहीं ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

परायों में अपनों को ढ़ूंढ़ना कठिन काम,
अपनों में* अपने को ढ़ूंढ़ना और कठिन,
अपने में अपने-आपको ढ़ूंढ़ना सबसे कठिन, पर सबसे उपयोगी भी ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

(* अपनों में परायों को ढ़ूँढ़ना भी बहुत कठिन )

“M” और “W” एक दूसरे से उल्टे होते हुये भी एक दूसरे के पूरक हैं ।
“M” और “W” में तीन दिशाओं में तो Boundaries हैं, पर चौथी दिशा जो खुली हुई है, दोनों के मिलने पर Complete/ चार-दीवारी में सुरक्षित और संयमित हो जाते हैं ।

चिंतन

संस्कार मातृभाषा में क्यों ?
माँ से जो सीखा, उस भाषा को हेय दृष्टि से देखने लगे, तो माँ को भी उसी दृष्टि से देखने लगते हैं, तब उनके दिये संस्कारों को भी उसी तरह हेय देखेंगे, तब ग्रहण कैसे करेंगे ?
उनके प्रति आदरभाव कैसे रहेगा ?
यही अंग्रेजी का दोष है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

गुरु और समुद्र दोनों ही गहरे हैं,
पर दोनों की गहराई में एक फ़र्क है….
समुद्र की गहराई में इंसान डूब जाता है,
और
गुरु की गहराई में इंसान तर जाता है ।

(मंजू)

कुत्ते की दुम का स्वभाव टेड़ा रहना है, यदि सीधी हो जाये तो कुत्ता पागल हो जाता है ।
आपको क्या स्वीकार है ?
टेड़ी पूँछ या पागल कुत्ता, जो अपने लिये तथा आपके लिये भी घातक होगा !

मुनि श्री अविचल सागर जी

सैना के पुल पर चलते समय, उनके मार्च की लय तोड़ दी जाती है । वरना मज़बूत पुल के भी टूटने का अंदेशा रहता है ।
सोचें ! यदि सामुहिक प्रार्थना एक साथ/ एक लय में की जाये तो उसमें कितनी ऊर्जा पैदा होगी !

चिंतन

वेद बिना संवेदना के साथ पढ़ने से सिर्फ अपनी वेदना समझ आयेगी ।
जिसके अंदर संवेदना है उसे वेद का ज्ञान तो हो ही जायेगा और सबकी वेदना भी समझ आयेगी ।

(यश – बड़वानी के प्रश्न का उत्तर)… मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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