दीपक को जलना है, हवा को चलना है, दीपक बुझता है ।
दोष हवा का नहींं, दोनों का अपना अपना स्वभाव है ।
दीपक क्या करे ?
बस ! दीपक अपने आसपास चिमनी लगा ले, वही हवा उसे प्रकाशित बने रहने के लिये Oxygen भी देगी ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
संसार कितना बचा, यह तय होता है कि आप संसार में कितना Involve हैं/ धंसे हुए हैं ।
चिंतन
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यदि हवाएं मौसम की गर्मी समाप्त कर सकती हैं, तो..यकीन कीजिए,
प्रार्थना भी मुसीबत के पल ख़त्म कर सकती है ।
हम सभी की खुशियों के लिए प्रार्थना करें ।
(अनुपम चौधरी)
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एक मुकाम जिंदगी में ऐसा भी आता है,
“क्या भूलना है” बस यही याद रह जाता है ।
(सुरेश)
और यह जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण मुकाम होता है,
मेरी जिंदगी में आ चुका है,
भूलने में प्रयत्नरत भी हूँ ।
सेवा से तो पुण्य और आनंद दोनों मिलते हैं,
पर कुपात्र की करने से दुर्गुण और सुपात्र की से सदगुण आने की संभावना रहती है ।
चिंतन
प्रभु के दरबार में कहते हो झोली भर दो,
जबकि कहना चाहिये – झोली छुड़ा दो ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
चाहे कितनी भी भलाई का काम कर लो…
उस भलाई की उम्र,
सिर्फ….!
अगली गलती होने तक ही है…!!
(सुरेश)
जरा* न चाहूँ,
अजर** बनूँ,
नजर*** चाहूँ ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
* रोग/थोड़ा भी
** निरोगी
*** गुरुकी/सम्यग्दृष्टि
कक्षा में एक बच्चे की घड़ी चोरी हो गयी । शिक्षक ने सब बच्चों की जेबें टटोलीं पर उससे पहले सब बच्चों की आंखें बंद रखने का आदेश दिया ।
एक बच्चे की जेब में घड़ी मिल गयी पर शिक्षक ने उस बच्चे को डाटा नहीं/ ना ही उसका नाम किसी को बताया ।
बड़े होने पर उस छात्र ने अपने शिक्षक से पूछा, तो जबाब था –
” उस घटना के लिए मैनें भी अपनी आंखें बंद कर ली थीं ”
अपनी इज्जत बची देखकर, वह बच्चा भी बदल गया और बहुत बड़ा शिक्षक बन कर, उसी ने यह संस्मरण सुनाया ।
(डॉ.पी.एन.जैन)
करुणा के भेद …
1. “करने वाली” – दूसरों के निमित्त से/दूसरों के लिये ।
पर निमित्त कितनी देर को मिलेंगे ?
सो करुणा भाव पराश्रित और अल्पसमय के लिये आयेंगे ।
2. “धारण करने वाली” – निरपेक्ष ।
लम्बे समय/हमेशा के लिये, मन वचन काय में, मुख्यत: अपने लिये ।
मुनि श्री अविचलसागर जी

(सुरेश)
आपके पास एक नकली नोट आ जाये तो पहले किसे चलाना चाहोगे ?
नकली… नोट/ गुरु/ शास्त्र और धर्म;
विज्ञापन और शक्ति का प्रयोग करके जो असली हैं, उन्हें चलन से बाहर कर देते हैं ।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
साधुजन अपनी रक्षा खुद नहीं करते, चाहे उनके पास कितनी भी मंत्रादि शक्त्तियाँ हों क्योंकि उसमें दुश्मन की हिंसा होगी ।
उनकी रक्षा का दायित्व श्रावकों पर होता है ।
मुनि श्री सुधासागर जी
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