साधुजन अपनी रक्षा खुद नहीं करते, चाहे उनके पास कितनी भी मंत्रादि शक्त्तियाँ हों क्योंकि उसमें दुश्मन की हिंसा होगी ।
उनकी रक्षा का दायित्व श्रावकों पर होता है ।
मुनि श्री सुधासागर जी
मंदिर परिसर में खंडित मूर्तियाँ नहीं रखनी चाहिये ।
उन्हें संग्रहालयों में भेज देना चाहिये ।
मुनि श्री सुधासागर जी
ग्वालियर में वर्षा कम होने का कारण – “नमी का कम होना” ।
इसीलिये रेगिस्तानों में बहुत कम तथा तटीय क्षेत्रों में बहुत ज्यादा बारिश होती है ।
ऐसे ही प्राय: पुण्य से पुण्य, पैसे से पैसा अर्जित होता है ।
चिंतन
मनचाहा बोलने के लिये,
अनचाहा सुनने की क्षमता भी होनी चाहिये ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी (यश के प्रश्न के जवाब में)
“कल” आएगा, यह बात तय है,
लेकिन हम उसे किस सूरत में देखना चाहते हैं,
यह हमें आज ही तय करना होगा….!
(सुरेश)
संत —- जिनसे मन शांत हो ।
साहित्य – जिनसे हित सधे ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
दुश्मन चाहे मनुष्य रूप में हो या कर्मरूप में, वह तो अपना स्वार्थ देखेगा ही ।
आप उसे यह नहीं कह सकते कि… हे ! मुसीबत मुझे मत सताओ ।
अपनी मन, वचन, काय रूपी ढाल तथा पुरुषार्थ रूपी तलवार से वीरों की तरह Defence/Attack करना होगा ।
मुनि श्री सुधासागर जी
बच्चों को राजकुमार मानो/राजकुमारों की तरह परवरिश करो, चलेगा ।
पर राजा मत मान लेना वरना वे ख़ुद तो सैनिक ही बन पायेंगे और माता-पिता उनके सेवक !
गौरव – चिंतन
मन का Waste बचाकर,Invest करो ।
Object से हटकर, Subject पर जाओ ।
Object तो एक के बाद एक आते ही रहते हैं, उनमें हम Subject ही भूल रहे हैं ।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
यदि कोई नहीं सुधरता, छोड़ दें ।
पर किसी को बिगाड़ने (आदतें खराब करके) में निमित्त तो ना बनें ।
चिंतन
पतली पगंडडी पर दो बकरियां आमने-सामने आ गयीं ।
एक बैठ गयी, दूसरी उसके ऊपर से निकल गयी ।
वरना एक या दोनों गिरतीं/गिराईं जातीं ।
मुनि श्री सुधासागर जी

संघ की आर्यिका माताओं के दीक्षा-दिवस पर आर्यिका विज्ञानमति माता जी अपनी दीक्षा के समय के भावों को व्यक्त करते हुए कहा… “उस समय मुझे लग रहा था कि मेरी वृद्धावस्था सी आ गयी है । संयम तो 8 वर्ष पर लेना चाहिए था । 14 वर्ष असंयम में बिगाड़ दिये ।”
समय से पहले फल चखने का भाव न करें ।
क्योंकि अधपका फल स्वादिष्ट नहीं, स्वास्थ्यवर्धक भी नहीं तथा उसमें हिंसा (जीवराशि) ज्यादा ।
ताप (तप) से पकाने पर लाभदायक ।
(इसीलिये जबलपुर के अस्पताल का नाम “पूर्णायु” रक्खा है)
आचार्य श्री विद्यासागर जी
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