हथेली तब भी छोटी थी,
हथेली अब भी छोटी है,
पहले खुशियां बटोरने में, चीजें छूट जातीं थीं ,
अब चीजें बटोरने में खुशियां, छूट जातीं हैं !

(सुरेश)

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मौत के डर से ही सही,…..
ज़िन्दगी को फुर्सत तो मिली…..
सड़कों को राहत…….
और घरों को रौनक तो मिली….
प्रकृति, तेरा रूठना भी ज़रूरी था…
इंसान का घमंड टूटना भी ज़रूरी था..
हर कोई ख़ुद को ख़ुदा समझ बैठा था..
ये शक दूर होना भी ज़रुरी था..!
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जानवर दूसरों के बच्चों का निवाला छीनकर अपने बच्चों को नहीं खिलाते। हिंसक जानवर भी एक जानवर को मार कर कई दिनों तक शिकार नहीं करते।

सिर्फ़ आदमी ज़िंदगी भर सुबह से शाम दूसरों का निवाला छीन-छीन कर अपना तथा अपने बच्चों का भरण-पोषण करता है।

चिंतन

भगवान को कर्ता मानने वाले कहते हैं – “ऊपर वाला पांसा फेंके, नीचे चलते दांव”,
कर्मों पर विश्वासी कहते हैं – “अंदर वाला पांसा फेंके, बाहर चलते दांव ।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

हम भगवान के अंश नहीं हैं, ना ही भगवान के बाइ-प्राॅडक्ट हैं। बल्कि भगवान बनने का जो कच्चामाल होता है, वह हैं ।
बस, परिष्कार करना है, सांचे में ढालना है, ख़ुद भगवान बन जायेंगे ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

ख़ुशी से संतुष्टि मिलती है और संतुष्टि से ख़ुशी |
परन्तु दोनों में फ़र्क बहोत बड़ा है ….
ख़ुशी थोड़े समय के लिए संतुष्टि देती है,
पर संतुष्टि हमेशा के लिए ख़ुशी देती है ।

(सुरेश)

एकाग्रता यानि एक को अग्र बना कर ध्यान करना ।
केन्द्र पर केन्द्रित करो, परिधि पर सब तुम्हारे चक्कर काटेंगे ।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

काया का कायल नहीं, काया में हूँ आज ।
कैसे काया-कल्प हो, ऐसा हो कुछ काज ।।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

(हम तो आज चाय के भी कायल हैं)

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