वक़्त-वक़्त पर* उन्हें न भूलें…
1) जिनसे बचना है
2) जिनसे संरक्षण होता है
3) जो हमारी प्रगति में बाधक हैं

* वक़्त-वक़्त पर – मौका/परीक्षा आने पर

आचार्य श्री विद्यासागर जी

दौड़-धूप, यानि धूप में दौड़ना ।
धूप होती है सीमेंट के जंगलों में ।
गांवों में सुकून है, वहाँ किसान संग्रह के पीछे नहीं भागता, संग्रह करेगा तो नाश हो जायेगा (अनाज सड़ जायेगा) ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

चढ़ता सूरज सुंदर लगता है ।
दोपहर का तेजस्वी/पसीना निकाल देता है/उसके सामने सब सिर झुकाते हैं ।
शाम को भाव होते हैं – “डूब मरो”

श्री लालमणी भाई-चिंतन*

* ख़ुद की ढलती उम्र में

राजा को चंदन की लकड़ी में, रंक को कंडों में जलाया जाता है ।
पर दोनों की राख एक सी, न चंदन वाली में सुगंध, न ही कंडों वाली में दुर्गंध ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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मौत के डर से ही सही,…..
ज़िन्दगी को फुर्सत तो मिली…..
सड़कों को राहत…….
और घरों को रौनक तो मिली….
प्रकृति, तेरा रूठना भी ज़रूरी था…
इंसान का घमंड टूटना भी ज़रूरी था..
हर कोई ख़ुद को ख़ुदा समझ बैठा था..
ये शक दूर होना भी ज़रुरी था..!
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जानवर दूसरों के बच्चों का निवाला छीनकर अपने बच्चों को नहीं खिलाते। हिंसक जानवर भी एक जानवर को मार कर कई दिनों तक शिकार नहीं करते।

सिर्फ़ आदमी ज़िंदगी भर सुबह से शाम दूसरों का निवाला छीन-छीन कर अपना तथा अपने बच्चों का भरण-पोषण करता है।

चिंतन

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