जहाँ दर्द ज्यादा, हमदर्द कम हों – उसे संसार कहते हैं ।

सब विनयों में, उपचार-विनय (शिष्टाचार में) Practical है ।
इसमें 100% नम्बर सहजता से ला सकते हैं ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

स्मरण तथा पुण्यार्जन के लिये भुला-भुला कर पढ़ना चाहिये ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

विनय यानि सामने वाले के अनुकूल प्रवृत्ति करना ।
ख़ुद से पूछें…
क्या हम बड़ों/ गुरु/ शास्त्र और भगवान की विनय करते हैं ?

मुनि श्री अविचलसागर जी

जैसे सकलपारा चासनी में “पग” जाता है/चासनी उसके कण कण में समा जाती है, ऐसे ही हम अपने हठाग्रह/भौतिकता से “पग” गये हैं ।
अति के पगने पर पागल हो जाते हैं,
इसी से उन्हें पग+लिया कहना भाव-संगत लगता है ।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

आयु कट रही है जैसे कैंची कपड़े काटती है,
कर्म बढ़ रहे हैं जैसे अलमारी में कपड़े,
क्या करें ?

कैंची तो अपना कर्तव्य करती ही रहेगी,
तुम्हारा कर्तव्य है – आयु बढ़ने के साथ साथ कपड़ों को कम करते चले जाना ।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

साधुजन अपनी रक्षा खुद नहीं करते ! चाहे उनके पास कितनी भी मंत्रादि शक्तियाँ हों ।
क्योंकि उसमें दुशमन की हिंसा का दोष लगेगा/ उत्तम-अहिंसा व्रत का पालन नहीं हो पायेगा ।
इनकी रक्षा का दायित्व, श्रावकों पर होता है ।

मुनि श्री सुधासागर जी

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