भगवान की “जय हो” के नारे क्यों लगाये जाते हैं ?
वे तो सब पर विजय प्राप्त कर चुके हैं !

“जय हो” नारा नहीं, जयघोष है…
भगवान जयवंत रहें, धर्म की प्रभावना हो/ धर्म बढ़े ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

ऊपरी बाधा प्राय: गाँवों/गरीबों में देखी जाती है, जेलों में एक भी केस नहीं सुना ।
क्योंकि इसका संबंध अंधविश्वास/ मनोविज्ञान/ अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति के लिये देखा जाता है ।

मुनि श्री सुधासागर जी

भगवान को कभी देखा नहीं फिर भी वे दु:ख में क्यों याद आते हैं ?

जिससे जितना पुराना और नज़दीकी रिश्ता होता है, वह उतना  ही ज्यादा याद आता है ।
भगवान से हमारा जन्म-जन्मांतरों का रिश्ता है/ वे हमारे रग-रग में बसे हैं/ मैं खुद भगवन-आत्मा बन सकता  हूँँ  ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

दीन/हीन की सेवा के बदले में कुछ पाने की भावना नहीं  रहती है,
पर पूजादि के बदले में कुछ पाने की भावना प्राय: रहती है ।

मुनि श्री निर्मोहसागर जी

भारत में वह है जो विश्व में कहीं नहीं ।
बाहर की भौतिकता को देखकर आँखें खुली रह जाती हैं,
भारत में आकर आँखें बंद हो जाती हैं (भक्ति में, वीतरागी की अर्धमुदी आँखों को देखकर )

आचार्य श्री विद्यासागर जी

धर्मकार्यों के खर्चे में से कटौती से गरीबों को दान करते हो तो दोनों को दोष,
अपने भोग-विलास/पाप क्रियाओं के खर्चे से गरीब को दान देने में तुमको भी पुण्य/गरीबों को भी ।

मुनि श्री सुधासागर जी

सांसारिकता में गुणा-भाग, पारिमार्थिकता में गुणात्मक प्रगति,
सांसारिकता में त्रिकोण/षटकोण, पारिमार्थिकता में दृष्टिकोण विषय रहता है ।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

“इक्कीस” (2021) = इक ईस (एक ईश)

आचार्य श्री विद्या सागर जी
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(2) एक में याद है, दूसरे में आस, एक को है तज़ुर्वा, दूसरे को विश्वास…
दोनों जुड़े हुए हैं ऐसे, धागे के दो छोर के जैसे, पर देखो दूर रहकर भी साथ निभाते हैं कैसे !
जो पिछला वर्ष छोड़ के जाता है, उसे नववर्ष अपनाता है, और जो पिछले वर्ष के वादे हैं, उन्हें नववर्ष निभाता है…
लेकिन गतवर्ष से नववर्ष बस १ पल मे पहुंच जाते हैं !
गतवर्ष की जुदाई को दुनिया ने एक त्यौहार बना रखा है..!!

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(अनुपम चौधरी)
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(3) “0” समाप्त हुआ, “1” प्रकट …प्रगति का संकेत ।
बुराइयाँ “0” हों, हमारे “0” होने के पहले,
हर-1 दिन, “1” अच्छाई जुड़े हम सबके जीवन में…1.1.21

चिंतन

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