पुराने पुण्यों से खटिया मिलती है,
नये पुण्य कमाने के लिये खटिया खड़ी करनी होती है ।
मुनि श्री अविचलसागर जी
आज के माँ-भक्त, हाथ पर माँ का टैटू बनवाकर, माँ से दूर चले जाते हैं ।
तप आदि के कष्ट वैसे ही हैं, जैसे फोड़े को ठीक करने के लिये डॉक्टर पहले फोड़े को फोड़ता है/कष्ट होता है ।
उपचार करा लेने पर भविष्य में सुकून/ आनंद,
न कराने पर कष्ट बढ़ता ही जाता है ।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
सरल बनने के दो तरीके हैं –
1. माला जपें – मुझे सरल बनना है ।
2. आसपास के लोगों को भी यही बता दें कि — मुझे सरल बनना है, आप में कुटिलता देखने पर आपको याद दिला देंगे कि आपको तो सरल बनना था न !
मुनि श्री अविचलसागर जी
ज्ञानीजन, कर्कशा पत्नि/दुर्जन पुत्र का नाम ही कर्म रख लेते हैं ।
पापोदय को काटने में सहजता हो जाती है ।
धन और धर्म की एक ही राशि होती है ।
धन फल है, धर्म जड़ है ।
मुनि श्री सुधासागर जी
बर्फ को आग भी गरम नहीं कर सकती ।
जल पी लेने से वह शरीर रूप Solid बन जाता है;
ऐसे ही हम क्रोध को पी जायें तो सामने वाले के अपशब्द हमको गरम नहीं कर पायेंगे ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
सूर्योदय लाल होता है (राग का प्रतीक)
दोपहर तपते तपते सफेद/तेजस्वी;
राग को कम/खत्म करने के लिये तप बहुत महत्वपूर्ण है ।
सूर्यास्त फ़िर लाल (ढ़लती उम्र में प्रायः राग फ़िर से उभर आता है),
सावधान !
ये लाली अंधकार में परिवर्तित हो जाती है !!
तीर्थों/गुरुओं के पास जाते हैं तो मन सुगंधि से भर जाता है, उसे घर तक कैसे बनायें रखें ?
बाग की सुगंधि का Essence बना कर घर पर ले आते हो, जब भी घर में दुर्गंध आती है तो सूंघ लेते हो,
ऐसे ही तीर्थों की विशुद्धि/ गुरुओं की शिक्षा मन में भर लाओ, ज़रूरत पर उस विशुद्धि को महसूस करो/ उपदेशों को याद कर लो।

(Aruna)
विदेशों में तिथियाँ वहाँ के देशांतर/अक्षांशादि से निकालना चाहिये ।
पर वहां ऐसे कलैंडरादि होते नहीं हैं इसलिये वहाँ भारत की तिथि मानते हैं ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
भौंरे और गोबर के कीड़े की मित्रता हो गई, भौंरा गुबरीले से मिलने गया तो उसको गोबर खाने को दिया, दुर्गंध सहनी पड़ी ।
गुबरीला भौंरे के घर गया तो उसे फूल पर बिठा दिया, खाने को सुगंधित पराग ।
माली उसे प्रभु चरणों में पहुँचा दिया ।
लोहे पर जंग ना लगने देने का उपाय –
उपयोग
जैसे हथौड़ा/चाकू/रेलपटरी/सुई यदि उपयोग में न आयें तो उन पर जंग लग जाती है ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
अपने दु:खों से दुखी होना वेदना, पाप-बंध;
दूसरों के दु:खों से दुखी होना संवेदना, पुण्य-बंध ।
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