मृत्यु के बाद कुछ समय तक शरीर के अवयवों में जान उनके अपने-अपने Cells की Energy से बनी रहती है,
जैसे हर दुकान पर कुछ ना कुछ सामान Stock में रहता है तथा गोदाम से Supply आती रहती है । गोदाम में आग लगने पर दुकान कुछ दिनों तक तो सामान देती रहती है ।

चिंतन

घर बनाने में श्रम तो चिड़िया और मकड़ी दोनों करतीं है,
पर मकड़ी का अभिप्राय दूसरों को फंसाना है, सो अंत में खुद भी उसी में फंस कर मरती है ।
चिड़िया बच्चों को आश्रय देने के लिये बनाती है, सो खुद भी सुरक्षित रहती है ।

व्यापारी इसीलिए…’शुभ’ पहले लिखते हैं, ‘लाभ’ बाद में ।

आचार्य श्री ज्ञानसागर जी(आचार्य श्री विद्यासागर जी के गुरु) कहते थे …

मानी को मान दे देना चाहिये (उपद्रव नहीं करेगा) ।
वैसे भी ईंधन को सिर पर ही रखते हैं, अंत में तो उस बेचारे को जलना ही होता है ।

स्वर्ग/नरक हैं भी या नहीं ?
हैं तो, क्यों ? सुख/दुःख तो हम यहाँ ही भोग रहे हैं ?

संसार के उत्कृष्ट सुख/दु:ख से भी अधिक सुख/दु:ख हो सकते हैं ना !
उसे भोगने जहाँ जाना होगा, वही स्वर्ग/नरक हैं ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

सोने की पहचान –
1. पीला रंग पीतल का भी, पर चमक में फर्क ।
2. अग्नि परीक्षा में और-और चमकता है ।

मूल्यवान का मूल्यांकन करना बहुमूल्य गुण है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

जो पाप रूप सामग्री पेट में डालते हैं तथा पाप करते हैं, उनका पापी-पेट ।
साधु, शुद्ध सामग्री लेने वाले का पेट पापी कैसे ?
वे पाप काटते हैं, उन पापों को जो पेट में पहले के भरे हुए हैं ।

छोटा सा कंकड़ तालाब में खुद तो डूब जाता है पर लहरें दूर-दूर तक छोड़ जाता है, जो पूरे वातावरण को हिला देती हैं ।
भौतिक सुख पाने की आकांक्षा ऐसी ही है ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

हर छत, ऊपर मंज़िल बनने पर फर्श बन जाती है ।
छत को घमंड ना आये, ऐसा क्या करें ?

यश-बड़वानी

हर उपलब्धि को छत की क्षण-भंगुरता की तरह देखें ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

जीवन-यात्रा… “क्या नहीं” से “क्या है” तक की ही होती है ।
प्यार पाने (प्यार तो कुत्ते से भी मिल जाता है) से इज्जत पाने तक की यात्रा है ।

(एकता – पुणे)

ज्योतिष-विज्ञान असफल हो सकता है, क्योंकि बहुत से जीवों की एक सी ग्रहदशा होती है ।
पर स्वर-विज्ञान नहीं क्योंकि वह हर व्यक्ति की विशेष होती है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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