कामना में इच्छा/आग्रह है, पूरी ना होने पर दल बदलते रहते हैं;
प्रार्थना में ना इच्छा है, न उसके पूर्ण होने का भाव और ना ही दलबदल;
प्रार्थना करते समय कामनायें समाप्त हो जाती हैं ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

सम्बंध बनाना जैसे मिट्टी पर मिट्टी लिखना,
सम्बंध निभाना जैसे पानी पर पानी लिखना ।
या कहें –
बनाना जैसे मिट्टी में पानी मिलाना,
निभाना जैसे मिट्टी में पानी बनाये रखना ।

थोड़े समय के लिये चीज़ों का त्याग करने से द्रव्य का आकर्षण छोड़ने का लाभ तो मिलेगा,
पर Period short होने से भावों में नियंत्रण नहीं रह पायेगा ।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

जीवन रूपी रथ के…
घोड़े – कर्म हैं,
पहिये – कर्मफल (धीरे/ तेज/ कीचड़ में धसना),
विवेक – सारथी (घोड़ों को optimum दौड़ाना पर थकाना नहीं; रथ को कीचड़ में न जाने देना ।

सुपथ पर चलोगे तो जीवन सरल, कुपथ पर हिचकोले लेगा ।

सत्यनिष्ठा की लौ पर,
रख दी सलीके से,
संयम की चिमनी;
प्रकम्पित न हो ताकि,
प्रलोभन की आंधी में ।

(गुरुवर मुनि श्री क्षमा सागर जी के प्रवचन से प्रेरित)..कमल कांत जैसवाल

यदि पहले तीनों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम) धर्मानुसार हैं तो मोक्ष-पुरुषार्थ तो होगा ही ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

कुत्ते की पूँछ सीधी करने का तरीका –
कुत्ते को बेस्वाद/कम भोजन दो (कमजोर हो जायेगा, पूँछ लटक जायेगी ) ।
मन/ विकारों को नियंत्रित करने का भी यही तरीका है ।

ना तो रात्रि में कुल्ला करें और ना ही बिना कुल्ला करे मंदिर में बोल कर अर्घ चढ़ायें (दुर्गंध न फैलायें)

मुनि श्री सुधासागर जी

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