आर्जव धर्म = मायाचारी का न होना ।

4 के साथ तो छल कभी भी न करें …
1) स्वयं से – हर छल में हम अपने को तो छलते ही हैं ।
2) स्वजनों से – क्या अपना Mobile बिना Lock किये अपनों को दे सकते हो ?
3) कल्याण-मित्र से – ..देते हैं भगवान को धोखा, इंसा को क्या छोड़ेंगे..!
4) धर्म क्षेत्र में – धर्म को इस्तेमाल किया तो भव-अवांतर रसातल में ।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

अहंकार का न होना ही मार्दव धर्म है ।

अहंकार रूपी पर्वत से जब नदी नीचे उतरती है तभी शांति के सागर में मिलकर विराट रूप धारण कर पाती है।

अहंकार …
क्या ?…. मैं कुछ हूँ, बड़ा या छोटा ।
जन्मता ?…अज्ञान से ।
पुष्ट ?…..आत्ममुग्धता से ।
नियंत्रित ?..जीवन के सत्य को जानने से…
1) मैं अन्य प्राणियों जैसी ही आत्मा हूँ
2) मेरे पास सब संयोगों से है
3) अस्थायी है
4) कर्माश्रित है ।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

पर्यूषण में Rituals से Spiritual की ओर बढ़ना है;
Spiritual यानि उतार/ चढ़ाव में स्थिरता ।

क्षमा यानि धरती जैसी सहिष्णुता ।
4 स्थितियों में …
1) स्वार्थवश
2) मज़बूरी में/ परिस्थितिवश
3) भड़ास निकालने के बाद
4) अंतरआत्मा से – असली/ उत्तम ।

जब 1) से 3) में क्षमा रखते हैं तो अंतरआत्मा से क्यों नहीं !
क्रोध के संस्कार तो हैं पर कलह मत होने दें;

कलह के कारण…
1) रुचि भेद
2) आग्रह
3) ग़लतफहमी
4) स्वार्थ/अहम् –
स्वार्थ सबसे बड़ा कारण है और अहम् उसे हवा देता है ।
बदले का मज़ा तो एक दिन का, क्षमा जीवन भर की ।
बदला नहीं बदलें ।
बार-बार भावना भायें… “मुझे क्षमा रखनी है”

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

पेड़ आदि को काटने में हिंसा कम, बकरे/मुर्गे में ज्यादा,
क्योंकि हिंसा आत्मा की नहीं, प्राणों (इंद्रियाँ,मन,वचन,काय आदि) की होती है ।
पेड़ में 4 प्राण (स्पर्शन-इंद्रिय,श्वांस,आयु,काय),
बकरे/ मुर्गे में 10 प्राण…
(वाणी,मन,पाँच-इन्द्रियां,श्वांस,आयु,काय) होते हैं ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

(तड़पते/खूनादि को देख कर दया  समाप्त होने लगती है/क्रूरता बढ़ती है/स्वयं की आत्मा का हनन भी होता है)

एक भिखारी सिर्फ सिक्के उठाता था, नोट वापस कर देता था ।
सब लोगों ने खेल बना लिया, वह बड़े बड़े नोट लौटा देता था ।
खेल खेल में लोगों के खूब सिक्के चले जाते थे ।

हम भी संसार में बुद्धु बन कर खूब खो रहे हैं, अपना पैसा (मूल्यवान जीवन) और समय बर्बाद कर रहे हैं ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

आज गुरुवर का 39वाँ पावन दीक्षा-दिवस है ।

शरीर से जो भी निकलता है, वह गंदा होता है, पर दूध क्यों नहीं ?
क्योंकि दूध वात्सल्य से निकलता है ।

आर्यिका श्री सुपार्श्वमती माताजी

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

स्वतंत्रता = क्रियात्मक जीवन
परतंत्रता = प्रतिक्रियात्मक जीवन

पहले देश पराधीन था पर सोच/चेतना आज़ाद थी,
आज देश आज़ाद लेकिन सोच/चेतना पराधीन ।

आचार्य श्री विद्या सागर जी …स्वराज तो आ गया, सुराज लायें । वह आयेगा…स्वभाषा, स्वशिक्षा, स्वरोज़गार, स्वदेशी से ।

मुनि श्री प्रमाण सागर जी

अधिक प्रकाशित दीपक वाले के साथ चलने में लाभ तो है,
पर जब वह अपने रास्ते या अपनी चाल से चलकर आपसे अलग हो जायेगा तब तुम रास्ता भटक जाओगे ।
सो उसके सानिध्य में रहकर अपना दिया प्रकाशित कर लो ।
धर्म सामूहिक भी है और व्यक्तिगत भी ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

रोना हो तो घर के अंदर ही रोना ।
दरवाजा तो हँस कर ही खोलना ।
यदि सामने वाले को पता लग गया कि तुम बिखर गये हो, तो वह एक एक ईंट उठा ले जायेंगे ।

मुनि श्री अजितसागर जी

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