गधे के ऊपर कितनी भी स्वादिष्ट सामग्री लाद दो,
पर उसके मुँह में स्वाद नहीं आयेगा ।
आर्यिका श्री विज्ञानमति माताजी
भगवान महावीर के समय एक कसाई रोज़ भैंसे मारता था । श्रेणिक राजा ने उसे जेल में डाल दिया । पर जेल में भी वह अपने शरीर से मैल की बत्ती बना-बना कर उन्हें नाख़ून से काटता था, क्या उसे भाव हिंसा का दोष नहीं लगेगा ?
श्री राम वनवास में 14 वर्ष तक धर्म कैसे करते थे, जंगल में मंदिर/ पूजा की सामिग्री तो थी नहीं !
जब कसाई को भावों से पाप लगा तो श्री राम को/ आज की परिस्थिति में हमको भावों से पुण्य नहीं मिलेगा !!
मुनि श्री सुधासागर जी
नेता नीति बना सकता है,
पर उसका Implementation जनता की नीयत तय करेगी ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
(धर्म के क्षेत्र में भगवान नीति बनाते हैं, गुरु बताते हैं, मैं 75 वर्ष से सुन रहा हूँ पर implementation की 75% नीयत भी नहीं बन पा रही)
जो फर्ज़ नहीं निभाते, वे फर्ज़ी ।
फर्ज़ निभाने के लिय, कर्ज़ का स्मरण बनाये रखना होगा ।
कोरोना जैसी महामारी से भी सीखो…सब संबंध धोखे के हैं,
हर व्यक्ति को छूने से भी डरो/ सावधानी बरतो चाहे वह अपना ही बच्चा क्यों न हो/ अपना ही शरीर क्यों न हो !
मुनि श्री सुधा सागर जी
जो सेवा की जाती है, वह सकाम सेवा है ;
जो सेवा होती है, वह निष्काम सेवा है
मुनि श्री प्रमाण सागर जी
*विपत्ति के समय निष्काम सेवा ही श्रेष्ठ सेवा है*
3 प्रकार की –
1. श्वान जैसी – जहाँ जहाँ मालिक जाता है, उसके पीछे पीछे चले ।
2. बिल्ली जैसी – कभी साथ, कभी नहीं ।
3. चूहे जैसी – अपना बिल बना लिया, मालिक आये या जाये ।
मुनि श्री सुधासागर जी
आप शिष्यों को अपने से इतनी दूर भेज देते हैं, उनसे संम्प्रेषण कैसे होता है ?
बिजली का खंभा कितनी भी दूर हो पर Connection* हो तो घर प्रकाशित होगा ना !
आचार्य श्री विद्यासागर जी
*गुरु आज्ञा/शिष्य की श्रद्धा
Fame is the praise bestowed on a good man
by
other good men.
आलोचना से लोचन खुलते हैं ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
इसलिये आलोचना का स्वागत करो (स्व+आगत)(अच्छे से बुलाना – पं.रतनलाल बैनाडा जी),
स्व का हितकारी/प्रिय मानकर ।
मुनि श्री सुधासागर जी
राज-सत्ता = दबाब से चलती है,
लोक-सत्ता = प्रेम से चलती है,
प्रभु-सत्ता = विशुद्धि से चलती है ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
The first step for getting the things you want out of life is …
DECIDE WHAT YOU WANT.
परोपकार नाम की कोई चीज़ नहीं होती, हम तो स्व पर उपकार करते हैं,
सामने वाला अपने पुण्य से अपना काम करा लेता है ।
(ऐसे ही अपकार नाम की कोई चीज़ नहीं होती, हम अपने पापोदय से अपना काम ख़राब करा लेते हैं, सामने वाले से/ सामने वाले को निमित्त बना कर)

अचानक ये पहाड़ी कैसे बन गयी,
पिछले 5-10 सालों में तो दिखती नहीं थी ?
यह दिल्ली के कूड़े का ढेर (गाजीपुर) है,
जो वातावरण के स्वच्छ होने से दिखने लगा है ।
Moral….
विचार स्वच्छ होने पर ही अपने मन की गंदगी दिखती है ।
चिंतन
और जैसे-जैसे मन की गंदगी कम होती जाती है, श्वेत(हिमालय की श्रंखला)/ शुद्धता द्रष्टिगोचर होती जाती है जैसा कमल जी ने अपनी टिप्पणी (नीचे) में चिंतन दिया है ।
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