जो देश/ समाज/ परिवार/ शरीर की बाधाओं के रहते हुये भी धर्म करने की राह निकाल ही ले ,
कृत से ना कर सके तो कारित या अनुमोदना से करे ।

पहले मंत्रों को सिद्ध करके काम करवाते थे,
फिर तंत्र विद्या आयी ;
ये दोनों भावनात्मक थे ।
अब यंत्र की बहुलता है जैसे क्रेन से बड़े बड़े सामान उठाना,
यह द्रव्यात्मक है ।

गुरु के समीप ही नहीं पहुँच पाते, दूर से ही दर्शन होते हैं तो दूरदर्शन पर क्यों ना करें ?
सूर्य दूरदर्शन पर दिखेगा तो पर ताप नहीं मिल पायेगा/उसके तेज का साक्षात अनुभव नहीं कर पाओगे ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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