यदि डूबते हुये को बचाने के लिये एक सीढ़ी नीचे उतरना पड़े तो उतरने में पाप नहीं लगेगा ।
(पर बचाने की प्रक्रिया में सीढ़ी से फिसलकर गर्त में मत चले जाना)

मुनि श्री सुधासागर जी

शमशान जाने पर वैराग्य भाव प्राय: सभी के आते हैं,
पर टिकते इसलिये नहीं क्योंकि वैराग्य का भाव-रूपी-बीज हम बंजर भूमि(धर्म-रूपी-आद्रता का अभाव) में डालते हैं ।

मुनि श्री विनिश्चयसागर जी

जब वर्तमान में निर्वाह आराम से चल रहा है तो कल के निर्वाण की चिंता क्यों करें ?

ताकि कम से कम, कल का निर्वाह भी चल सके,
और भविष्य में कभी निर्वाह की चिंता ना करनी पड़े,
इसी को तो निर्वाण कहते हैं।

चिंतन

कामना उतनी ही करो जितनी औकात हो (पुण्य हों) ।
मज़दूर ने ज़मींदार की शानदार घोड़ी देख, भगवान से ऐसी ही घोड़ी मांगी ।
तभी घोड़ी के घोड़ी पैदा हुई, जमींदार ने घोड़ी की बच्ची मज़दूर के सिर पर रखवाकर मीलों दूर अपने घर ले गया ।

प्राय: धर्मात्मा निर्धन क्यों होते हैं ?

समझदार माँयें बच्चों को उतना ही देती हैं जितने में उनका पालन हो सके, ताकि वे बिगड़ ना जायें ।
पूर्व के पापोदय से धर्मात्मा निर्धन तो हो सकता है, पर दु:खी नहीं ।

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