जब तक इनके चक्कर में रहेंगे, शुद्ध नहीं हो सकते हैं ।

क्षु.श्री ध्यानसागर जी

किसी ने पूछा – भगवान दु:ख दूर करते हैं ?
साधु ने कहा -ना रे ! भगवान किसी का दुःख दूर नहीं करते ! यदि दु:ख दूर ही करना होता, तो देते ही क्यों ?

फिर दुःख दूर कौन करता है ?
साधु – भगवान का “नाम” दु:ख दूर करता है । उनके “स्मरण” में मन का “रमण” होने लगे तो दुःख का “मरण” निश्चित है!

???????? सुरेश ????????

भक्ति हमें आलसी या अहंकारी नहीं बनाती, बल्कि सच्चा पुरुषार्थ करने की प्रेरणा देती है ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

एक खेत में देवता रहता था ।
किसान उसमें खेती करने गया तो दोनों में साझेदारी का सौदा हो गया ।
देवता ने नीचे की फसल मांगी तो किसान ने बाजरा बो दिया, देव ने अगली बार ऊपर की मांगी तो किसान ने मूँगफली बो दी ।
देव ने ऊपर तथा नीचे की दोनों में मांगी तो उसने मक्का बो दी ।

इनमें से कौन बड़ा ?

जिन्हें गुरु प्राप्त नहीं होते, उनमें एकलव्य बड़ा,
जिन्हें गुरु प्राप्त होते हैं, उनमें अर्जुन बड़ा ।

मुनि श्री सुधासागर जी

पुण्य की ज़रूरत तब तक, जब तक हमसे पाप हो रहा है । कीचड़ पाप है, इसे साफ करने पुण्य रूपी जल चाहिये,
बिना पानी के शरीर पर कीचड़ सूख जायेगी, चमड़ी उधड़ जायेगी ।
साधु पाप नहीं करते, इसलिये उन्हें पुण्य की आवश्यकता नहीं ।

मुनि श्री सुधासागर जी

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