मन और पानी का एकसा स्वभाव होता है… जिन परिस्थितियों/ बर्तन में जाता है इसी का आकार ग्रहण कर लेता है। दूसरा… जहाँ ढलान मिल जाए वहीं चला जाता/ बहने लगता है।
यदि आकार को स्थिर रखना हो तो पानी को जमा देते हैं/ मन को संकल्पों से बांध देते हैं। तब पानी/ मन की 3D अवस्था हो जाती है… आचरण रूपी तीसरा डाइमेंशन भी आ जाता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 1 अक्टूबर)

बनावटी जीवन की पोल तब खुल जाती है जब उसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 1 अक्टूबर)

(जैसे कर्ण की विद्याएं तब काम नहीं आयीं जब उनकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी)।

हर व्यक्ति अलग-अलग दावे करते हैं जैसे “मैं पुत्र हूँ”। तब वैसी ही क्रिया शुरू हो जाती है।
कभी मैं “भगवान हूँ”, ऐसा दावा क्यों नहीं किया ?
यदि करते, तो वैसी गुणवत्ता झलकने लगती।
पूरे दिन में ऐसे दावे के साथ जीने का कुछ समय तो निर्धारित कर लो।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

आज के ही दिन जब अपना देश रात को 12:00 बजे आज़ाद हो रहा था, उस समय महात्मा गांधी जी सो रहे थे। उनका 9:00 सोने का नित्य नियम था।
वे अनियमितता की गुलामी से आज़ाद हो रहे थे।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 15 अगस्त)

कांटे में तकलीफ़/दर्द नहीं, शरीर में भी नहीं।
जब कांटा शरीर में लगता है तब दर्द होता है।
आत्मा में दु:ख नहीं, शरीर में भी नहीं, जब आत्मा शरीर के साथ मिलती है तब दु:ख महसूस होता है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

श्री मोती चंद्र शाह (श्री बाल गंगाधर तिलक के साथ में) स्वतंत्रता संग्रामी थे। किसी व्यक्ति ने एक अंग्रेज को गोली मार दी। श्री शाह ने प्रतिक्रिया करते हुए कहा…”उस व्यक्ति ने गलत नहीं की।”
इस पर अंग्रेजों ने नाराज़ होकर फांसी की सजा दे दी। फांसी से पहले आखिरी इच्छा पूछने पर आपने कहा… जिंतूर के वीतरागी भगवान के दर्शन करने हैं। दर्शन करके आपने भगवान के सामने बैठकर अन्न जल त्याग कर दिया और खुशीखुशी फांसी पर चढ़ गए।
ऐसे समर्पण को बार-बार नमन !

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 12 अगस्त)

Senior Citizen होने पर बड़ी-बड़ी तीर्थयात्राएँ नहीं हो पातीं तो क्या करें ?
Senior होने से पहले बड़ी-बड़ी यात्राएँ पूरी कर लें।
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे –
Senior का मतलब – “See + Near”, यानी अपने अंदर देखना शुरु करो।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

दान देकर जो खुद ही अपने दान की बार-बार अनुमोदना करते हैं, उनको अतिरिक्त पुण्य मिलता है।
यदि दान देकर दुखी हुए तो अर्जित पुण्य में हानि होगी।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 11 अगस्त)

जीव की तरह बीज भी आज़ादी चाहता है। किसान के पुरुषार्थ बिना भी अंकुरित हो जाता है। 2 ग्राम का बीज टनोंटन माटी को हटाकर वृक्ष बन जाता है लेकिन मान किया तो फिर मिट्टी में मिल जाएगा। लता को सहारा नहीं मिला तो वह मंजिल की यात्रा नहीं कर पाती।
आज़ादी को Attain करना आसान है, Maintain करना मुश्किल।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 10 अगस्त)

क्रोध में कही गई बात प्राय: सत्य के करीब होती है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

(पर कहा तो यह जाता है कि नशे में आदमी सच बोलता है ?— आर के जैन
क्रोध भी तो एक प्रकार का मानरूपी नशा ही तो है !)।

“माँ” कहने पर मुँह खुल जाता है/ माँ के सामने ही मुँह खुलता है।
स्वतंत्रता संग्राम में मुँह खोलने की पहल करने वालों के नाम भी “म” से शुरू थे, महावीर सिंह, मोहन सिंह, मंगल पांडे आदि।
“पिता” कहते ही मुँह बंद हो जाता है।
माँ और पिता यही तो सिखाते हैं…मुँह कब बंद रखना और कब खोलना।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 29 जुलाई)

बादलों में जरा सी दरार पड़ जाए तो बादल फट जाते हैं, सर्वनाश कर देते हैं।
बच्चों से अपेक्षाएं/ बच्चों को सराहना की चाहत, दरार की शुरुआत है जैसे एक बार गलत बटन लगाने की शुरुआत हो गई तो अंत में एक होल बाकी रह ही जाता है जो बादल फटने के लिए पर्याप्त होता है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 29 जुलाई)

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