वर्तमान का पापी यदि वैभव संपन्न है तो पूर्व के पुण्य से,
पर
वर्तमान के पाप उसे आकुलता, बदनामी तथा भविष्य की दुर्गति का कारण बनते हैं ।
पुण्य हो तो तिनके का सहारा भी तार देता है ,
पापोदय में जहाज़ भी डुबा देता है ।
संबंधों से अपनी पहचान मत बनाना,
वरना संबंध समाप्त होते ही आप ज़ीरो बन जाओगे ।
क्षु.श्री ध्यानसागर जी
अज्ञानी व्यक्ति ग़लती छिपाकर
बड़ा बनना चाहता है,
औऱ
ज्ञानी व्यक्ति ग़लती मिटाकर
बड़ा बनना चाहता है ।
(सुरेश)
हमें धर्म की बातें याद क्यों नहीं रहतीं ?
याद वही बातें रहती हैं…
जिनके प्रति आकर्षण और रूचि होती है या जिनको कर्तव्य की श्रेणी में रखते हैं ।
प्रत्यक्ष संपर्क ही ज़रूरी नहीं है, वरना भगवान और भक्त के बीच, संबंधों का महत्त्व ही समाप्त हो जाएगा ।
रामायण
किसी ने क्या ख़ूब कहा है…
ऐ मौत ! जरा पहले आना, ग़रीब के घर;
कफ़न का खर्च, दवाओं में न निकल जाए…!
(डा.अमित राजा)
शुरू के Overs में अच्छे रन Score कर लें, तो अंत के Overs में Pressure नहीं आएगा ।
भाग्य से संयोग मिलता है, पुरुषार्थ से सदुपयोग ।
जहाँ मन टिक जाए, उस पर श्रद्धा होती है ।
जिस पर श्रद्धा होती है, उस पर मन लगता है ।
क्षु. श्री ध्यानसागर जी
चिंतामणी से जो माँगो, मिल जाता है ।
पर धर्म से तो बिना माँगे, सब कुछ मिल जाता है ।
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(Apurva Shri)
इच्छाओं के निरोध का पहला कदम है – दूसरों से अपेक्षा कम करते हुए, समाप्त करना ।
सरल को पहले tackle करना/गरम खिचड़ी के बाहर वाली पहले खाना ।
यदि दूसरों से अपेक्षा रखी, तो उपेक्षा के लिए तैयार रहें ।
मोक्षमार्ग कष्टप्रद ?
इष्ट पर द्रष्टि हो तो कष्ट कैसा !
जैसे तिल से तेल निकालना, पाषाण से स्वर्ण आदि ।
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