“दिल” बड़ा हो तो
“दोस्त” बनते हैं..
और…
“अक्ल” बड़ी हो तो…
“दुश्मन” ।

(ललित)

मोह में स्वाभिमान रह नहीं सकता ।

अभिमान को ही स्वाभिमान मान लेते हैं ।
सम्मान की इच्छा रखना अभिमान है,
ऐसे कार्यों से बचना, जिससे अपमानित ना होना पड़े, यह स्वाभिमान है ।

एक शिष्य रोज़ाना पूछता था – आत्मा/परमात्मा प्रत्यक्ष दिखाओ ।
एक दिन, ऊपर से कुछ भारी वस्तु उसके ऊपर आ गिरी, उसके मुँह से आ निकला – “हे प्रभु, बचाओ” ।
गुरु – जिसने पुकारा वह आत्मा, जिसे पुकारा वह परमात्मा ।
दिख गए दोनों !!

भूखे को भोजन, थोड़ी देर को साता देता है,
पर उपवास का महत्त्व समझा दो, तो हमेशा के लिये पीड़ा हर जाती है ।
भगवान की भक्ति में कष्ट नहीं होता बल्कि दु:ख/पीड़ा का हरण हो जाता है ।
भक्ति सहने की शक्ति देती है ।

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