अनुभूति का संबंध जाति/पर्याय से नहीं है ;
ज्ञानी को नहीं, अंर्तज्ञानी को होती है ।
मुख्यत: कर्म से वैभव,
धर्म से संतोष और शान्ति ।
सो अन्तरंग में धर्म रखकर कर्म करो,
खटकर्म से दूर रहो ।
पहली कमाई परमार्थ में लगाना चाहिए ।
(जैसे गाय का पहला दूध प्रयोग नहीं करते )
चिंतन
माँ जन्म देती है, सो उपकारी;
गुरु जन्म,जरा,मृत्यु से छुटकारा दिलाने का रास्ता दिखाते हैं, सो परम-उपकारी ।
घमंड से अपना सर ऊँचा न करें,
जीतने वाले भी अपना गोल्ड मैडल सिर झुका के हासिल करते हैं..!
(सुरेश)

(Manju)
कभी कभी धागे बड़े कमज़ोर चुन लेते हैं, हम !
और फिर
पूरी उम्र, गाँठ बाँधने में ही निकल जाती है !!
(सुरेश)
पैसा तो चोर डाकू भी कमा लेते हैं, इसे अर्थोपार्जन कहेंगे;
नीति से कमाया धन अर्थोपार्जन नहीं, अर्थ-पुरुषार्थ कहलाता है ।
नियम सब हमने बनाए हैं ताकि हम बने रह सकें,
लेकिन हो यह रहा है कि नियम तो बनते जा रहे हैं लेकिन हम टूटते जा रहे हैं ।
गुरुवर पूज्य मुनि श्री क्षमा सागर जी
लोभ : वर्तमान का नष्ट न हो जाए,
तृष्णा : भविष्य में और और आए ।
यम आने से पहले अपने विकारों के लिए संयम के हथियार लिए, ख़ुद यम बन जाओ ।
शरीर स्वयं(अपनी आत्मा) का सोचा नहीं करता है,
क्योंकि आत्मा, शरीर के लिए परद्रव्य है ।
(मंजु)

(Suresh)
Success with a Negative Attitude is called……..
“Luck”.
But
Success with Positive Attitude is called……..
“Achievement”.
Always be an ACHIEVER.
(Ravi Kant)
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