माल जब तक दुकान में हो तब तक मोह फिर भी समझ आता है, माल बिकने के बाद मोह कैसा ?
पर हम तो जीव के जाने के बाद (दूसरी दुकान पर चले जाने के बाद) भी मोह कर रहे हैं ।

जो पाता है ,सो भाता नहीं,
जो भाता है ,सो पाता नहीं ।
इसीलिये साता नहीं ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

जब निर्जीव खरबूजा खरबूजे को देखकर रंग बदल सकता है, तो हम तो सजीव हैं तो अच्छी/बुरी संगति का असर हम पर नहीं होगा ?

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

पं. श्री दरबारीलाल जी कोठिया न्यायाचार्य के समाधिमरण के दौरान उन्होंने आचार्य श्री को बताया की शरीर बहुत तंग कर रहा है ।
आचार्य श्री – आप तो न्यायाचार्य हैं जो शरीर ने आपके साथ किया, वही आप उसके साथ कीजिये ।

मुनि श्री कुंथुसागर जी

जूना होने पर कपड़ा किसी और के काम का नहीं रहता ,
पर जो किसी के भी काम का नहीं रह जाता, वह अपने काम का हो जाता है ।

श्री लालमणी भाई

(जो दूसरों की कद्र करना जानते हैं वे वृद्धावस्था के अनुभवों को जूना बना कर अपने मैल साफ कर लेते हैं )

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