दूसरों को अपने चरणों में झुकाना तो आसान है,
पर क्या तुम अपने चरणों में झुक सकते हो ?
झुकने योग्य मानते हो ?
पैर तभी चरण बनते हैं, जब वे आचरण से धुलकर साफ हो जाते हैं ।

ब्र. नीलेश भैया

कैसे मान लूँ की तू पल पल में शामिल नहीं,
कैसे मान लूँ की तू हर चीज़ में हाज़िर नहीं ।
कैसे मान लूँ की तुझे मेरी परवाह नहीं,
कैसे मान लूँ की तू दूर है पास नहीं ।
देर मैंने ही लगाई पहचानने में ,मेरे ईश्वर !
वरना तूने जो दिया उसका तो कोई हिसाब ही नहीं ।
जैसे जैसे मैं सर को झुकाता चला गया,
वैसे वैसे तू मुझे उठाता चला गया ।

(श्रीमति पारुल- बड़ौदा)

हाथ पैर तो तैरने वाला भी मारता है और जिसे तैरना नहीं आता वो भी ।
फिर दूसरा ड़ूबता क्यों है ?

हाथ पैर सलीके से चलाना नहीं आता ।
सलीका आने के बाद तो हाथ पैर चलाना बंद करके भी वह तैरता रहता है, ड़ूबता नहीं है ।

ब्र. नीलेश भैया

एक गुण को भी यदि उत्कृष्ट बना लिया तो वह छोटे मोटे बहुत से अवगुणों को बहा देगा ।
जैसे नदी में कितने भी मगरमच्छ हों, एक छोटी सी नाव पार लगा देती है, शर्त यह है कि नाव मजबूत हो ।

चिंतन

  • कल पर्युषण पर्व चला गया ।
    पर क्या सचमुच पर्व चला गया ?
    जाता वही है जो पहले कभी आया हो ।
    पर क्या पर्युषण पहले हमारे अंदर कभी आया था !
    पहचान ?
    यदि हमारे जीवन में बुराईयाँ कम हुई हों, गुण बढ़े हों, तो हमारे जीवन में वह पर्व आया था ।
  • पर्युषण से पहले और बाद में क्षमा दिवस मनाते हैं ।
    पूर्व की क्षमा इसलिये ताकि हमारे जीवन में नरमी/आद्रता आये ,धर्म का अंकुर पनप सके ,
    बाद की क्षमा इसलिये ताकि धर्म हमारे जीवन में टिक सके, आद्रता बनी रह सके ।
  • क्या हमारे जीवन में क्षमा आयी है ?
  • पहचान ?
    यदि हमारे दुश्मन कम हुये हैं और मित्र बढ़े हैं तो क्षमा हमारे जीवन में आयी है ।
    हम सब संसार के सब जीवों से क्षमा भाव रखें और वे सब जीव हमें क्षमा करें ।
  • संसार से विश्राम की दशा का नाम ही ब्रम्हचर्य है ।
  • स्त्री के पीछे भागना और स्त्री से दूर भागना, बात एक ही है ।
    जब तक ये यात्रा जारी है, समझो कि ब्रम्हचर्य की यात्रा अभी शुरू नहीं हुई है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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