विपरीत परिस्थितियों से डरो मत, पर बचो,
सिर पर आ ही जाये तो सहो (समतापूर्वक) ।

चिंतन

गाय का दूध निकालना – प्रकृति,
दूध का फटना – विकृति,
दूध से घी निकालना – संस्कृति ।

प्रकृति को विकृति से बचायें, संस्कृति की रक्षा हो जायेगी ।
संस्कृति/संस्कार माँ है , इसकी Market Value नहीं होती,  Moral Value होती है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

क्रोध आँधी है।
अपने साथ विवेक तथा बुध्दि को उड़ा ले जाती है।
आँधी के निकल जाने के बाद पता लगता है कि आँधी अपने साथ क्या क्या बहुमूल्य चीजों को उड़ा ले गयी।

(दिव्या – लंदन)

मक्खन निकालने की बिलौनी जैसा होना चाहिये विचार-विमर्श ।

एक तरफ की ड़ोरी खिंचे तो दूसरी ओर की ढ़ीली हो, तब मक्खन निकलेगा ।
यदि दोनों ओर से रस्सी को अपनी अपनी ओर खींचते ही रहे ,तो कुछ भी सारगर्भित नहीं निकलेगा, सिर्फ समय की बर्बादी होगी ।

(रस्सी टूट जायेगी, गांठ वाली ड़ोरी से फिर मक्खन नहीं निकलेगा/आगे के विचार-विमर्श से भी कुछ हासिल नहीं हो पायेगा)

केला खाने के बाद छिलका गाय को, तो दानी ।
कचरे में, तो भोगी ।
सड़क पर, तो नाशी ।

कम से कम छिलके का तो सदुपयोग कर लो ।

मुनि श्री कुंथुसागर जी

“Walking” is the best exercise…!
‘Walk Away’ from arguments that lead you to nowhere but anger.
‘Walk Away’ from people who delebrately put you down.
‘Walk Away’ from any thought that reduces your worth.
‘Walk Away’ from failures and fears that stifle your dreams.
The more you ‘Walk Away’ from things that poison your soul, the happier your life would be.
Gift Yourself A Walk Towards Happiness

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